अध्यात्मरामायण, अरण्यकाण्ड, चतुर्थ सर्ग (भाग-२)
*अध्यात्मरामायण*
*अरण्यकाण्ड*
*चतुर्थ सर्ग (भाग-२)*
*पंचवटीमें निवास और लक्ष्मणजीको उपदेश*
*श्लोक संख्या ३१ से ५५ समाप्ति तक*
जीव और परमात्मा यह पर्याय शब्द हैं—दोनोंका अभिप्राय एक ही है; अतः इसमें भेद-बुद्धि नहीं (करनी चाहिए)। अभिमानसे दूर रहना, दम्भ और हिंसा आदिका त्याग करना॥३१॥
दूसरों के किये हुए आक्षेपादिको सहन करना, सर्वत्र सरल भाव रखना, मन, वचन और शरीरके द्वारा सच्ची भक्तिसे सद्गुरुकी सेवा करना॥३२॥
बाह्य और आन्तरिक शुद्धि रखना, सत्कर्मोंमें तत्पर रहना, मन, वाणी और शरीरका संयम करना, विषयोंमें प्रवृत्त न होना॥३३॥
अहंकारशून्य रहना, जन्म, मृत्यु, रोग और बुढ़ापे आदिके कष्टोंका विचार करना, पुत्र स्त्री और धन आदिमें आसक्ति तथा स्नेह न करना॥३४॥
इष्ट और अनिष्टकी प्राप्तिमें चित्तको सदा समान रखना, मुझ सर्वात्मा राममें अनन्य बुद्धि रखना॥३५॥
जनसमूहसे शून्य पवित्र देशमें रहना, संसारी लोगोंसे सर्वदा उदासीन रहना॥३६॥
आत्मज्ञानका सदा उद्योग करना तथा वेदान्तके अर्थका विचार करना—इन उक्त साधनोंसे तो ज्ञान प्राप्त होता है और इनके विपरीत आचरण करनेसे विपरीत फल (अज्ञान) मिलता है॥३७॥
जिससे ऐसा बोध होता है कि मैं बुद्धि, प्राण, मन, देह और अहंकार आदिसे विलक्षण नित्य शुद्ध बुद्ध चेतन आत्मा हूँ वही ज्ञान है यह मेरा निश्चय है। जिस समय इसका साक्षात् अनुभव होता है उस समय इसीको विज्ञान कहते हैं॥३८-३९॥
आत्मा सर्वत्र पूर्ण, चिदानन्दस्वरूप, अविनाशी, बुद्धि आदि उपाधियोंसे शून्य तथा परिणामादि से रहित है॥४०॥
यह अपने प्रकाशसे देह आदिको प्रकाशित करता हुआ भी स्वयं आवरणशून्य, एक अद्वितीय और सत्य ज्ञान आदि स्वरूप तथा संगरहित, स्वप्रकाश और सबका साक्षी है—ऐसा विज्ञानसे जाना जाता है। जिस समय आचार्य और शास्त्रके उपदेशसे जीवात्मा और परमात्माकी एकताका ज्ञान होता है उसी समय मूला अविद्या अपने कार्य (शरीरादि) तथा इन्द्रियोंके सहित (अर्थात् अपने स्थूल और सूक्ष्म कार्यके सहित) परमात्मामें लीन हो जाती है॥४१-४३॥
अविद्याकी इस लयावस्थाको ही मोक्ष कहते हैं, आत्मामें यह (मोक्ष) केवल उपचारमात्र है (वास्तवमें आत्माकी मुक्तावस्था आगन्तुक नहीं है वह तो सदा ही मुक्त है)। हे रघुनन्दन लक्ष्मण! तुम्हें मैंने यह ज्ञान, विज्ञान और वैराग्यके सहित परमात्मरूप अपना मोक्षस्वरूप सुनाया। किन्तु जो लोग मेरी भक्तिसे विमुख हैं उनके लिए मैं इसे अत्यन्त दुर्लभ मानता हूँ॥४४-४५॥
जिस प्रकार नेत्र होते हुए भी लोग रात्रिके समय (अन्धकारमें) चोर आदिका चिह्न (निशान) भली प्रकार नहीं देखते, दीपक होनेपर ही उस समय वह दिखायी देता है, उसी प्रकार मेरी भक्तिसे युक्त पुरुषोंको ही आत्माका सम्यक् साक्षात्कार होता है। अब मैं अपनी भक्तिके कुछ वास्तविक उपाय बताता हूँ, (सावधान होकर) सुनो॥४६-४७॥
"मेरे भक्तका संग करना, निरन्तर मेरी और मेरे भक्तोंकी सेवा करना, एकादशी आदिका व्रत करना, मेरे पर्वदिनोंको मानना,॥४८॥
मेरी कथाके सुनने, पढ़ने और उसकी व्याख्या करनेमें सदा प्रेम करना, मेरी पूजामें तत्पर रहना, मेरा नाम-कीर्तन करना"॥४९॥
इस प्रकार जो निरन्तर मुझमें लगे रहते हैं उनकी मुझमें अविचल भक्ति अवश्य हो जाती है। फिर बाकी ही क्या रहता है?॥५०॥
अतः (यह निश्चित बात है कि) मेरी भक्तिसे युक्त पुरुषको ज्ञान, विज्ञान और वैराग्य आदिकी शीघ्र प्राप्ति होती है और फिर वह मोक्ष प्राप्त कर लेता है॥५१॥
इस प्रकार मैंने तुम्हारे प्रश्नानुसार यह सम्पूर्ण (रहस्य) तुम्हें सुना दिया। जो व्यक्ति अपने चित्तको इसमें समाहित करके रहता है वह मोक्ष प्राप्त कर लेता है॥५२॥
हे लक्ष्मण! मेरी भक्तिसे विमुख पुरुषोंसे इसे सावधानतापूर्वक न कहना चाहिये और मेरे भक्तोंको प्रयत्नपूर्वक बुलाकर भी यह रहस्य सुनाना चाहिये॥५३॥
जो पुरुष इसे श्रद्धा और भक्तिपूर्वक सदैव पढ़ेगा वह अज्ञानसमूहसे बने हुए अन्धकारको हटाकर मुक्त हो जायगा॥५४॥
जो पुरुष मेरी सेवामें अनुरक्त-चित्त, निर्मल-हृदय, शान्तात्मा, विमलज्ञानसम्पन्न और मेरे परम भक्त योगिजनोंका संग, अनन्य बुद्धिसे सर्वदा उनकी सेवामें तत्पर रहकर करता है; मुक्ति उसके करतलगत रहती है और मैं सर्वदा उसकी दृष्टिके सम्मुख विराजमान रहता हूँ। इसके अतिरिक्त और किसी उपायसे मेरा दर्शन नहीं हो सकता॥५५॥
*इति श्रीमदध्यात्मरामायणे उमामहेश्वरसंवादे अरण्यकाण्डे चतुर्थ: सर्ग:॥४॥*
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