अध्यात्मरामायण, अरण्यकाण्ड, पञ्चम सर्ग (भाग-२)

*अध्यात्मरामायण* 


*अरण्यकाण्ड* 


*पञ्चम सर्ग (भाग-२)* 


*शूर्पणखाको दण्ड, खर आदि राक्षसोंका वध और शूर्पणखाका रावणके पास जाना*


*श्लोक संख्या ३२ से ६१ समाप्ति तक*


तब श्रीरामचन्द्रजीने अपनी कमर कसी और कठोर धनुष तथा दो अक्षयबाणवाले तरकश बाँधकर युद्धके लिये तैयार हो गये॥३२॥ 

तदनन्तर राक्षसगण वहाँ आकर रामके ऊपर नाना प्रकारके अस्त्र-शस्त्र, पत्थर और वृक्षादिकी वर्षा करने लगे॥३३॥ 

श्रीरामचन्द्रजीने एक क्षणमात्रमें लीलासे ही उन अस्त्र-शस्त्रादिको तिल-तिल करके काट डाला। फिर सहस्रों बाणोंसे उन सम्पूर्ण राक्षसोंको मारकर खर, दूषण और त्रिशिराको भी मार डाला। इस प्रकार रघुवंशियोंमें श्रेष्ठ श्रीरामचन्द्रजीने आधे पहरमें ही उन समस्त राक्षसोंका संहार कर दिया॥३४-३५॥

तब लक्ष्मणजीने गुहामेंसे सीताजीको लाकर श्रीरघुनाथजीको सौंप दिया। उस समय सम्पूर्ण राक्षसोंको मरे हुए देख वे बड़े विस्मित हुए॥३६॥ 

जनकनन्दिनी श्रीसीताजीने प्रसन्नमुखसे श्रीरामचन्द्रजीका आलिंगन किया और उनके शरीरमें हुए शस्त्रके घावोंपर हाथ फेरने लगीं॥३७॥ 

उन सम्पूर्ण श्रेष्ठ राक्षसोंको मरे देख राक्षसराज रावणकी बहिन शूर्पणखा दौड़ती हुई लंकामें पहुँची और राजसभामें पहुँचकर रोती हुई रावणके पैरोंके समीप पृथ्वीपर गिर पड़ी। अपनी बहिनको इस प्रकार भयभीत देखकर रावण बोला—॥३८-३९॥

"अरी वत्से! उठ, खड़ी हो। बता तो सही तुझे किसने विरूपा किया है? हे भद्रे! यह इन्द्रका काम है अथवा यम, वरुण और कुबेरमेंसे किसीने किया है? बता, एक क्षणमें ही मैं उसे भस्म कर डालूँगा"॥४०½॥

तब राक्षसी शूर्पणखाने उससे कहा—"तुम बड़े ही प्रमादी और मूढ़बुद्धि हो॥४१॥ 

तुम मद्यपानमें आसक्त, स्त्रीके वशीभूत और सब विषयोंमें नपुंसक-जैसे दिखायी पड़ते हो। तुम्हारे चार (खुफिया पुलिस) रूप नेत्र नहीं है; फिर तुम राजा कैसे रह सकोगे?॥४२॥ 

युद्धमें खर मारा गया तथा दूषण और त्रिशिरा आदि चौदह सहस्र मुख्य-मुख्य राक्षसोंको राक्षसशत्रु रामने एक क्षणमें ही मार डाला और सारे जनस्थानको मुनीश्वरोंके लिये सर्वथा निर्भय कर दिया। इतना उत्पात हो जानेपर भी तुम्हें अभीतक कुछ पता ही नहीं है इसीलिये मैं कहती हूँ कि तुम मूढ़ हो"॥४३-४४॥ 

*रावण बोला—* 

अरी! तू बता तो, वह राम कौन है? उसने किसलिये और किस प्रकार इन राक्षसोंको मारा? तू सब बात विस्तारपूर्वक कह, मैं उसका मूलोच्छेद कर डालूँगा॥४५॥ 

*शूर्पणखा बोली—* 

एक दिन जनस्थानसे मैं गौतमीके किनारे जा रही थी, वहाँ पूर्वकालमें मुनिजनोंसे सेवित एक पंचवटी नामक आश्रम है॥४६॥ 

उस आश्रममें मैंने जटा-वल्कलादिसे सुशोभित धनुर्बाणधारी कमलनयन शोभाधाम रामको देखा॥४७॥ 

उसका छोटा भाई लक्ष्मण भी उसीके समान रूपवान् है तथा उसकी विशाललोचना भार्या भी रूपमें साक्षात् दूसरी लक्ष्मी-जैसी ही है॥४८॥

हे राजन्! देव, गन्धर्व, नाग और मनुष्य आदिमेंसे किसीकी भी स्त्री ऐसी रूपवती न देखी है और न सुनी है। वह शुभलक्ष्णा अपनी कान्तिसे सम्पूर्ण वनको प्रकाशित कर रही थी॥४९॥ 

हे अनघ! उसे तुम्हारी पत्नी बनानेके लिये मैंने लानेका प्रयत्न किया था, इसीसे रामके भाई लक्ष्मणने मेरी नाक काट डाली॥५०॥ 

फिर रामकी प्रेरणासे महाबली लक्ष्मणने मेरे कान भी काट लिये। तब मैं अत्यन्त दु:खसे रोती हुई खरके पास गयी॥५१॥ 

उसने भी अपने राक्षस-सेनापतियोंके साथ तुरंत जाकर रामसे युद्ध ठाना; किन्तु उस बलशाली रामने एक क्षणमें ही वे समस्त भीमविक्रम राक्षस नष्ट कर दिये। हे प्रभो! मुझे तो ऐसा मालूम होता है कि यदि रामके मनमें आ जाय तो वह निस्सन्देह आधे निमेषमें ही सम्पूर्ण त्रिलोकीको भस्म कर सकता है। किन्तु यदि उसकी स्त्री सीता तुम्हारी भार्या हो जाय तो तुम्हारा जीवन सफल हो जायगा॥५२-५४॥ 

अतः हे राजेन्द्र! तुम ऐसा प्रयत्न करो जिससे सम्पूर्ण लोकोंमें एकमात्र सुन्दरी कमलनयनी सीता तुम्हारी प्राणप्रिया हो जाय॥५५॥ 

हे प्रभो! तुम रामके सामने साक्षात् न ठहर सकोगे, इसलिये उन रघुश्रेष्ठको किसी प्रकार मायाजालसे मोहित कर तुम उसे प्राप्त कर सकते हो॥५६॥

यह सुनकर राक्षसराज रावणने सुन्दर वाक्यों और दान-मानादिसे बहिन शूर्पणखाको धैर्य बँधाकर अपने अन्त:पुरमें प्रवेश किया, किन्तु वहाँ चिन्ताके कारण उसे रात्रिको नींद नहीं आयी॥५७॥ 

(वह सोचने लगा—) ('बड़े आश्चर्यकी बात है,) अकेले मनुष्यमात्र रघुवंशी रामने बल-वीर्य और साहससम्पन्न मेरे भाई खरको सेनाके सहित कैसे मार डाला?॥५८॥ 

अथवा यह राम मनुष्य नहीं है, साक्षात् परमात्माने ही पूर्वकालमें की हुई ब्रह्माकी प्रार्थनासे मेरी सेनाके सहित मुझे वानरसेनाओंसे मारनेके लिये इस समय रघुवंशमें मनुष्यरूपसे अवतार लिया है॥५९॥ 

यदि परमात्माद्वारा मैं मारा गया तब तो मैं वैकुण्ठका राज्य भोगूँगा, नहीं तो चिरकालपर्यन्त राक्षसोंका राज्य तो भोगूँगा ही।' इसलिये मैं (अवश्य) रामके पास चलूँगा॥६०॥ 

सम्पूर्ण राक्षसोंके स्वामी रावणने इस प्रकार विचारकर भगवान् रामको साक्षात् परमात्मा हरि जानकर (यह निश्चय किया कि) मैं विरोध-बुद्धिसे ही भगवान्‌के पास जाऊँगा (क्योंकि) भक्तिके द्वारा भगवान् शीघ्र प्रसन्न नहीं हो सकते॥६१॥ 

*इति श्रीमदध्यात्मरामायणे उमामहेश्वरसंवादे अरण्यकाण्डे पञ्चम: सर्ग:॥५॥*

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