अध्यात्मरामायण, अरण्यकाण्ड, षष्ठ सर्ग

*अध्यात्मरामायण* 


*अरण्यकाण्ड* 


*षष्ठ सर्ग* 


*रावणका मारीचके पास जाना*


*श्रीमहादेवजी बोले—* 

हे पार्वति! रात्रिके समय इस प्रकार विचारकर प्रातःकाल होनेपर बुद्धिमान् रावण रथमें सवार हुआ और अपने मन-ही-मन एक कार्य निश्चय कर वह समुद्रके दूसरे तटपर मारीचके घर गया। वहाँ मारीच मुनियोंके समान जटा-वल्कलादि धारणकर प्राकृत गुणोंके प्रकाशक निर्गुण भगवान्‌का ध्यान कर रहा था। समाधि भंग होनेपर उसने रावणको अपने घर आया देखा॥१-३॥ 

रावणको देखते ही वह शीघ्रतासे उठ खड़ा हुआ और उससे गले मिलकर उसकी विधिपूर्वक पूजा की तथा आतिथ्य-सत्कारके अनन्तर जब रावण स्वस्थ होकर बैठा तो मारीच उससे बोला—॥४॥ 

"हे रावण! इस समय तुम एक ही रथके साथ आये हो और तुम्हारा चित्त किसी कार्यके विचारमें चिन्ताग्रस्त-सा प्रतीत होता है॥५॥ 

यदि गोपनीय न हो तो मुझे वह कार्य बताओ। हे राजेन्द्र! यदि उसके करनेमें मुझे पाप न लगे और वह न्यायानुकूल हो तो कहो, मैं तुम्हारा वह प्रिय कार्य अवश्य करूँगा"॥६॥

*रावण बोला–*

(कहते हैं—) राजा दशरथ अयोध्यापुरीका अधिपति है, उसका ज्येष्ठ पुत्र सत्यपराक्रमी राम है॥७॥ 

उस अपने मुनिजनप्रिय पुत्रको दशरथने स्त्री और छोटे भाई लक्ष्मणके सहित वनमें भेज दिया है॥८॥ 

इस समय वह घोर दण्डकारण्यके पंचवटी नामक शुभ आश्रममें रहता है। (सुना है,) उसकी भार्या विशालनयना सीता त्रिलोकीको मोहित करनेवाली है॥९॥ 

वह राम मेरे बड़े पराक्रमी निरपराध राक्षसोंको भाई खरके सहित मारकर उस तपोवनमें निर्भयतापूर्वक बड़े आनन्दसे रहता है॥१०॥ 

मेरी बहिन शूर्पणखाने उसका कुछ भी नहीं बिगाड़ा था; किन्तु उस दुष्टने उसके नाक-कान काट डाले और अब निर्भयतापूर्वक उस वनमें रहता है॥११॥ 

इसलिये अब तुम्हारी सहायतासे मैं रामके तपोवनमें न रहनेपर उसकी प्राणप्रिया सीताको ले आना चाहता हूँ॥१२॥ 

तुम मायासे मृगरूप होकर राम और लक्ष्मणको आश्रमसे दूर ले जाना। उसी समय मैं सीताको हर लाऊँगा। इस प्रकार मेरी सहायता करके तुम फिर पूर्ववत् अपने आश्रममें आ रहना॥१३½॥

रावणको इस प्रकार कहते देख मारीचने विस्मित होकर कहा—॥१४॥ 

"रावण! ये सर्वनाश करनेवाली बातें तुम्हें किसने बतायी हैं? इस प्रकार जो कोई तुम्हारा नाश करना चाहता है, निश्चय ही वह तुम्हारा शत्रु है और वध करने योग्य है॥१५॥

हे रावण! उनके बाल्यकालके पौरुषको याद करके, जब वे विश्वामित्रजीकी यज्ञ-रक्षाके लिये आये थे और उन्होंने एक बाणसे ही मुझे सौ योजन दूर समुद्रके तटपर फेंक दिया था, तबसे मैं भयसे व्याकुल हो जाता हूँ। बारम्बार उसी बातका स्मरण हो आनेसे मुझे सब ओर राम-ही-राम दिखलायी देने लगते हैं॥१६-१८॥ 

एक दिन अपने पूर्व-वैरका स्मरण कर मैं दण्डकारण्यमें भी अपने-जैसे बहुत-से मृगोंके साथ मिलकर एक तीखे सींगोंवाले मृगका रूप बनाकर गया था॥१९॥ 

जब मैं बड़ी फुर्तीसे सीता और लक्ष्मणके सहित श्रीरघुनाथजीको मारनेकी इच्छासे आगे बढ़ा तो मुझे देखकर उन्होंने केवल एक बाण छोड़ दिया॥२०॥ 

हे राक्षसेन्द्र! उसीसे हृदय बिंध जानेके कारण मैं आकाशमें चक्कर काटता हुआ समुद्रमें आकर गिरा। तबसे मैं भयभीत होकर इस निर्भय स्थानमें रहता हूँ॥२१॥ 

राज, रत्न, रमणी और रथ आदि (भोग सामग्रियोंके प्रथम अक्षर 'र')-के कानोंमें पड़ते ही मुझे (रामकी याद आ जानेसे) भय उत्पन्न हो जाता है, इसलिये मैं भोग-समुदायसे भयभीत होकर निरन्तर 'राम' का ही ध्यान करता रहता हूँ॥२२॥ 

'यहाँ राम न आ गये हों' इस आशंकासे मैंने समस्त बाह्य कार्य छोड़ दिये हैं। जिस समय मैं निद्राके वशीभूत होकर सोता हूँ उस समय मन-ही-मन रामका ही स्मरण करता रहता हूँ॥२३॥

इस प्रकार स्वप्नमें देखे हुए श्रीरघुनाथजीको जब निद्रा टूटनेपर जागता हूँ तब भी नहीं भूलता। अतः हे रावण! तुम भी श्रीराघवसे हठ छोड़कर अपने घर चले जाओ॥२४॥ 

और चिरकालसे चले हुए अपने राक्षस-वंशकी रक्षा करो। (श्रीरामचन्द्रजीसे वैर न करो,) उनका तो (वैरभावसे) स्मरण करनेसे भी सर्वस्व नष्ट हो जाता है। मैं तुम्हारे हितके लिये जो कुछ कहता हूँ वह मानो। तुम परमात्मा श्रीरघुनाथजीसे विरोध-बुद्धि छोड़ दो और भक्तिभावसे उनका भजन करो; क्योंकि श्रीरामचन्द्रजी बड़े दयालु हैं। मैंने मुनीश्वरोंके मुखसे ये सभी बातें सुनी हैं कि सत्ययुगमें ब्रह्माजीके प्रार्थना करनेपर परमात्मा श्रीहरिने कहा था कि तुम अपना मनोरथ बताओ, मैं उसे पूर्ण करूंँगा। तब ब्रह्माजीने भगवान्‌से कहा—'हे कमललोचन हरे! आप मनुष्यरूपसे पृथिवीमें अवतार लीजिये और शीघ्र ही दशरथनन्दन श्रीराम होकर देवद्रोही दशाननका वध कीजिये'॥२५-२७॥ 

अतः तुम निश्चय मानो, राम मनुष्य नहीं है; वे साक्षात् अव्ययपुरुष श्रीनारायण हैं, माया से मनुष्यरूप होकर वे निर्भयतापूर्वक पृथिवीका भार उतारनेके लिये वनमें आये हैं। अतः हे तात! तुम सुखपूर्वक घर लौट जाओ"॥२८½॥

मारीचके ये वचन सुनकर रावण बोला—॥२९॥ 

"यदि ब्रह्माकी प्रार्थनासे परमात्मा ही राम होकर मनुष्यरूपसे मुझे मारनेके लिये प्रयत्नपूर्वक यहाँ आये हैं, तो वे शीघ्र ही अवश्य वैसा ही करेंगे; क्योंकि ईश्वर सत्य-संकल्प हैं। इसलिये मैं अवश्य यत्नपूर्वक रघुनाथजीके पाससे सीता को ले आऊँगा॥३०-३१॥ 

हे वीर! यदि मैं युद्धमें उनके हाथसे मारा गया तो परमपद प्राप्त करूँगा और यदि मैंने ही रामको रणक्षेत्रमें मार डाला तो निर्भयतापूर्वक सीताको पाऊँगा॥३२॥ 

अतः हे महाभाग! उठो और शीघ्र ही विचित्र मृगरूप धारण कर राम और लक्ष्मणको आश्रमसे अति दूर ले जाओ, फिर पूर्ववत् अपने आश्रममें आकर सुखपूर्वक रहो। यदि मुझे भयभीत करनेके लिये अब और कुछ कहोगे तो निश्चय मानो, मैं अभी इसी खड्गसे तुम्हें यहीं मार डालूँगा"॥३३-३४½॥

उसका यह कथन सुनकर मारीचने मन -ही-मन सोचा—॥३५॥ 

'यदि श्रीरघुनाथजीने मुझे मारा तो मैं संसार-सागर से पार हो जाऊँगा और जो कहीं इस दुष्टने मुझे मार डाला तो निश्चय ही मुझे नरकमें पङना होगा'॥३६॥ 

इस प्रकार श्रीरामके हाथसे ही अपना मरना निश्चयकर वह शीघ्रतासे उठा और रावण से बोला—"हे राजन्! हे प्रभो! मैं आपकी आज्ञा पालन करूँगा"॥३७॥ 

ऐसा कह वह (रावणके) रथपर चढ़कर श्रीरामचन्द्रके आश्रममें आया और चाँदीकी बूँदोंके सहित शुद्धसुवर्णवर्ण विचित्र मृग-रूप धारण किया॥३८॥ 

उसके सींग रत्नमय, खुर मणिमय और नेत्र नीलरत्नमय थे। इस प्रकार बिजलीकी-सी छटा और मनोहर मुखवाला वह मृग रामचन्द्रजीके आश्रमके पास सीताजीके सामने वनमें विचरने लगा॥३९-४०॥ 

किसी क्षण तो वह चौकड़ी मारने लगता और कभी पास आकर ठिठक जाता, फिर भयसे (भागने लगता)। इस प्रकार वह वंचक मायामृगरूप धारणकर सीताजीको मोहित करता हुआ विचरने लगा॥४१॥  

*इति श्रीमदध्यात्मरामायणे उमामहेश्वरसंवादे अरण्यकाण्डे षष्ठः सर्गः*

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