अध्यात्मरामायण, अरण्यकाण्ड, अष्टम सर्ग (भाग-२)
*अध्यात्मरामायण*
*अरण्यकाण्ड*
*अष्टम सर्ग (भाग-२)*
*सीताजीके वियोगमें भगवान् रामका विलाप और जटायुसे भेंट*
*श्लोक संख्या ३० से ५६ समाप्ति तक*
यह सुनकर श्रीरघुनाथजीने (जटायुके पास जाकर) उसे कण्ठगतप्राण और अति दीन अवस्थामें देखा। तब वे आँखोंमें आँसू भरकर उसपर हाथ फेरते हुए (बोले—)॥३०॥
"हे जटायो! कहो। मेरी सुमुखी भार्या सीताजीको कौन ले गया है? (अहो!) तुम मेरे कार्यके लिये मारे गये। अतः अवश्य ही तुम मेरे प्रिय बन्धु हो"॥३१॥
जटायुने रक्त वमन करते हुए लड़खड़ाती बोलीमें कहा—"हे राम! महापराक्रमी राक्षसराज रावण मिथिलेशनन्दिनी सीताको दक्षिणकी ओर ले गया है और अधिक कहनेकी मुझमें शक्ति नहीं है। मैं अभी आपके सामने ही प्राण छोड़ना चाहता हूँ॥३२-३३॥
हे राम! आज बड़े भाग्यसे मैंने मरते समय आपको देख पाया है। ही अनघ! आप मायामानवरूप साक्षात् परमात्मा विष्णु ही हैं॥३४॥
हे रघुश्रेष्ठ! वैसे तो अन्त समय आपका दर्शन करनेसे ही मैं मुक्त हो गया, तथापि आप मुझे अपने कर (कमलों)-से स्पर्श कीजिये। फिर मैं आपके परमपदको जाऊँगा"॥३५॥
तब रामचन्द्रजीने मुसकराते हुए 'बहुत अच्छा' कह उसका शरीर अपने करकमलोंसे छुआ। तदनन्तर जटायु प्राण छोड़कर पृथिवीपर गिर पड़ा॥३६॥
रामचन्द्रजीने नेत्रोंमें जल भरकर उसके लिए अपने स्वजनके समान शोक करते हुए लक्ष्मण से लकड़ियाँ मँगवा उसका दाह-कर्म किया॥३७॥
*श्रीरघुनाथजी बोले—*
"जटायो! तुम मेरे परमपदको जाओ और आज सबके देखते-देखते मेरा सारूप्य प्राप्त करो"॥४०॥
तदनन्तर वह तुरंत ही सुन्दर दिव्य रूप धारण कर एक सूर्य-सदृश प्रकाशमान विमानपर आरूढ़ हुआ॥४१॥
उस समय वह सुन्दर पीताम्बर धारण किये शंख, चक्र, गदा, पद्म और किरीट आदि श्रेष्ठ आभूषणोंके सहित अपने प्रकाशसे (सम्पूर्ण दिशाओंको) प्रकाशित कर रहा था॥४२॥
वैसे ही वेश–भूषावाले चार विष्णुपार्षद उसकी पूजा कर रहे थे तथा योगी गण उसकी स्तुति कर रहे थे। तदनन्तर वह त्वराके साथ हाथ जोड़कर श्रीरघुनाथजीको सम्बोधन कर उनकी स्तुति करने लगा॥४३॥
*जटायु बोला*—
'जो अगणित गुणशाली हैं, अप्रमेय हैं, जगत्के आदिकारण हैं तथा उसकी स्थिति और लय आदिके हेतु हैं, उन परम शान्तस्वरूप परमात्मा श्रीरामचन्द्रजीको मैं निरन्तर प्रणाम करता हूँ॥४४॥
जो असीम आनन्दमय और श्रीकमलादेवीके कटाक्षके आश्रय हैं तथा जो ब्रह्मा और इन्द्र आदि देवगणोंका दुःख दूर करनेवाले हैं, उन धनुष-बाणधारी वरदायक नरश्रेष्ठ श्रीरामचन्द्रजीके प्रति मैं अहर्निश प्रणत हूँ॥४५॥
जो त्रिलोकीमें सबसे अधिक रूपवान् हैं, (सबके) स्तुत्य हैं, सैकड़ों सूर्योंके समान तेजस्वी हैं तथा वांछित फल देनेवाले हैं उन शरणप्रद और प्रेमी हृदयमें रहनेवाले श्रीरघुनाथजीकी मैं अहर्निश शरण लेता हूँ॥४६॥
जिनका नाम संसाररूप वनके लिये दावानलके समान है, जो महादेव आदि देवताओंके भी (पूज्य) देव हैं तथा जो करोड़ों दानवेन्द्रोंका दलन करनेवाले और श्रीयमुनाजीके समान श्यामवर्ण हैं, उन दयामय श्रीहरिकी मैं शरण लेता हूँ॥४७॥
जो संसारमें निरन्तर वासना रखनेवालोंसे अत्यन्त दूर हैं और संसारसे उपराम मुनिजनोंके सदैव दृष्टिगोचर रहते हैं तथा जिनके चरणरूप पोत (जहाज) संसारसागरसे पार करनेवाले हैं, उन रघुनाथजीकी मैं शरण लेता हूँ॥४८॥
जो श्रीमहादेव और पार्वतीजीके मन (मन्दिर)-में निवास करते हैं, जिनका चरित्र अति मनोहर है तथा देव और असुरपतिगण जिनके चरणकमलोंकी सेवा करते हैं, उन गिरिवरधारी देवताओंके वरदायक रघुनायककी मैं शरण लेता हूँ॥४९॥
जो परधन और परस्त्रीसे सदा दूर रहते हैं तथा पराये गुण और परायी विभूतिको देखकर प्रसन्न होते हैं, उन निरन्तर परोपकारपरायण महात्माओंसे सुसेवित कमलनयन श्रीरघुनाथजीकी मैं शरण लेता हूँ॥५०॥
जिनका मुखकमल मनोहर मुसकानसे सुशोभित हो रहा है, जो (भक्तोंके लिये) अति सुलभ हैं, जिनके शरीरकी कान्ति इन्द्रनीलमणिके समान सुन्दर नीलवर्ण है तथा जिनके मनोहर नेत्र श्वेत कमलकी-सी शोभावाले हैं, उन महादेवजीके परम गुरु श्रीरघुनाथजीकी मैं शरण लेता हूँ॥५१॥
(हे प्रभो!) जलसे भरे हुए पात्रोंमें जैसे एक ही सूर्य प्रतिबिम्बित होता है वैसे ही सत्त्व, रज और तम—इन तीनों गुणोंके साथ सम्बन्ध-युक्त होकर आप ही विष्णु, ब्रह्मा और महादेवरूपसे भासित होते हैं। देवराज इन्द्रकी भी स्तुतिके पात्र परमेश्वरस्वरूप आपकी मैं स्तुति करता हूँ॥५२॥
आपका दिव्य शरीर करोड़ों कामदेवोंसे भी सुन्दर है, सैकड़ों मार्गोमें फँसे हुए लोगोंसे आप अत्यन्त दूर हैं और यतिश्रेष्ठोंके हृदयमें आप सदा ही भासमान हैं। ऐसे आप आर्तिहर प्रभु रघुपतिकी मैं शरण लेता हूँ"॥५३॥
जटायुके इस प्रकार स्तुति करनेपर श्रीरघुनाथजी उसपर प्रसन्न होकर बोले,—"जटायो! तुम्हारा कल्याण हो, तुम मेरे परमधाम विष्णुलोकको जाओ॥५४॥
जो पुरुष मेरे इस स्तोत्रको एकाग्रचित्तसे सुनता, लिखता अथवा पढ़ता है वह मेरा सारूप्यपद प्राप्त करता है और मरते समय उसे मेरा स्मरण होता है"॥५५॥
पक्षिराज जटायुने रघुनाथजीका यह कथन बड़े हर्षसे सुना और उन्हींके समान रूप धारण कर ब्रह्मासे अत्यन्त पूजित परमधामको चला गया॥५६॥
*इति श्रीमदध्यात्मरामायणे उमामहेश्वरसंवादे अरण्यकाण्डेऽष्टमः सर्गः॥८॥*
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