अध्यात्मरामायण, अरण्यकाण्ड, नवम सर्ग (भाग-१)

 *अध्यात्मरामायण* 


*अरण्यकाण्ड* 


*नवम सर्ग (भाग-१)* 


*कबन्धोद्धार*


*श्लोक संख्या १ से २९ तक*


*श्रीमहादेवजी बोले—*

(हे पार्वति!) तदनन्तर श्रीरामचन्द्रजी दुःखी होकर फिर सीताजीको खोजते हुए लक्ष्मणजीके साथ दूसरे वनको गये॥१॥ 

वहाँ उन्होंने एक बड़े ही विचित्र आकारका राक्षस देखा, जिसके वक्षःस्थलमें ही एक बड़ा भारी मुख था, जो नेत्र तथा कर्ण आदिसे रहित था॥२॥ 

इस राक्षसकी भुजाएँ एक-एक योजन तक फैली हुई थीं। यह सम्पूर्ण प्राणियोंकी हिंसा करनेवाला 'कबन्ध' नामक दैत्यराज था॥३॥ 

उसकी भुजाओंके बीचमें चलते हुए उनसे घिरे हुए राम और लक्ष्मणने उस महाबलवान् राक्षसको देखा॥४॥ 

तब रामचन्द्रजीने हँसते हुए कहा— "लक्ष्मण! इस राक्षसको देखो; यह सिर-पैरसे रहित है और इसकी छातीमें ही मुँह है॥५॥ 

अपनी भुजाओंसे ही इसे जो कुछ मिल जाता है उसीको खाकर यह जीवित रहता है। हम भी निश्चय ही इसकी भुजाओंके बीचमें फँस गये हैं॥६॥ 

हे रघुनन्दन! इसके चंगुलमेंसे निकलनेका हमें कोई मार्ग दिखायी नहीं देता; अब हमें क्या करना चाहिये? (जल्दी विचार करो नहीं तो) यह हमें अभी खा जायगा"॥७॥

*लक्ष्मणजीने कहा—*

"हे राघव! इसमें अधिक विचारनेकी क्या बात है? हम दोनों सावधान होकर अभी इसकी एक-एक भुजा काट डालें"॥८॥

*रामचन्द्रजीने कहा—*

'बहुत ठीक' और खड्गसे उसकी दायीं भुजा काट डाली। वैसे ही लक्ष्मणजीने भी तुरंत ही उसकी बायीं भुजा उड़ा दी॥९॥

तब उस दैत्यने अति विस्मयपूर्वक (कहा—) "मेरी भुजाओंको काटनेवाले तुम कौन देवश्रेष्ठ हो? इस लोकमें अथवा स्वर्गवासी देवताओंमें भी कोई ऐसा (समर्थ) होना सम्भव नहीं"॥१०॥

इसपर कमलनयन श्रीरामचन्द्रजीने हँसते हुए कहा—"श्रीमान् महाराज दशरथ अयोध्याके स्वामी थे॥११॥ 

मैं उन्हींका पुत्र 'राम' हूँ और यह बुद्धिमान् मेरा छोटा भाई 'लक्ष्मण' है तथा त्रैलोक्यसुन्दरी जनकनन्दिनी सीता मेरी भार्या है॥१२॥ 

हम मृगया (शिकार)-के लिये बाहर गये हुए थे कि किसी राक्षसने सीताको चुरा लिया, उसीको ढूँढ़ते हुए हम यहाँ इस घोर वनमें आ गये। इतनेहीमें तुमने हमें अपनी भुजाओंसे घेर लिया। तब हमने अपने प्राण बचानेके लिये तुम्हारी भुजाएँ काट डालीं। अब यह बताओ—ऐसे विकट रूपवाले तुम कौन हो?"॥१३-१४॥

*कबन्धने कहा—*

"यदि आप राम हैं और स्वयं मेरे पास आये हैं तो मैं धन्य हूँ। पूर्वकालमें मैं रूप और यौवनके मदसे उन्मत्त एक गन्धर्वराज था॥१५॥ 

हे रघुश्रेष्ठ! मैंने तपस्याद्वारा ब्रह्माजीसे अवध्यता (किसीसे भी न मारे जा सकनेकी योग्यता) प्राप्त कर ली थी और मैं अपनी रूपकान्तिसे सुन्दर स्त्रियोंके चित्तोंको चुराता हुआ सम्पूर्ण लोकोंमें घूमा करता था॥१६॥ 

एक बार अष्टावक्र मुनिको देखकर मैं हँस पड़ा; अतः उन्होंने क्रोधित होकर कहा—"अरे दुष्ट दुर्बुद्धे! तू राक्षस हो जा"॥१७॥ 

(उनके शापसे भयभीत होकर जब) मैंने उनकी स्तुति की तो तपके कारण परम तेजस्वी उन दयालु मुनीश्वरने मेरे शापका अन्त इस प्रकार बताया॥१८॥ 

(वे बोले—) "त्रेतायुगमें स्वयं नारायण दशरथके यहाँ अवतार लेकर तेरे पास आयेंगे और वे तेरी एक-एक योजन लंबी भुजाओंको काट डालेंगे॥१९॥ 

तब तू शापसे छूटकर अपना पूर्वरूप धारण करेगा।" उनके इस प्रकार शाप देनेसे मैंने अपनेको राक्षसरूपमें देखा॥२०॥

हे राम! एक बारमें रोषपूर्वक देवराज इन्द्रके पीछे दौड़ा। तब उसने क्रोधित होकर मेरे सिरपर अपना वज्र मारा॥२१॥ 

हे रघुनन्दन! उस वज्रके आघातसे मेरे सिर और पैर पेटमें घुस गये। किन्तु ब्रह्माजीके वरके प्रभावसे मैं मरा नहीं॥२२॥ 

मुझे मुखहीन देखकर समस्त देवताओंने दयावश हो देवराजसे कहा—"यह बिना मुखके कैसे जीवित रह सकेगा?"॥२३॥ 

तब इन्द्रने मुझसे कहा—"तेरे पेटमें ही मुख होगा और तेरी भुजाएँ एक-एक योजन लंबी हो जायँगी, अब तू यहाँसे चला जा"॥२४॥ 

इन्द्रके ऐसा कहनेपर मैं यहीं रहकर नित्यप्रति अपनी भुजाओंसे वनके जीवोंको खींचकर खाता रहा हूँ। हे अनघ! अब उन भुजाओंको आपने काट डाला॥२५॥ 

हे रघुकुलश्रेष्ठ! अब आप मुझे एक अग्नि और ईंधनसे युक्त गड्ढेमें डाल दीजिये। आपके द्वारा अग्निसे दग्ध होनेपर अपना पूर्वरूप धारण कर मैं आपकी भार्याका पता बताऊँगा"॥२६½॥

उसके इस प्रकार कहनेपर श्रीरामचन्द्रजीने लक्ष्मणजीसे तुरंत ही एक बड़ा गड्ढा तैयार कराया और उसे उसमें डालकर लकङियोंसे जला दिया। तब उसके शरीर से एक सर्वालंकारविभूषित कामदेवके समान अति सुन्दर पुरुष प्रकट हुआ॥२७-२८॥ 

उसने रामचन्द्रजीकी परिक्रमा कर उन्हें साष्टांग प्रणाम किया और भक्तिसे गद्गद-कण्ठ हो हाथ जोड़कर कहने लगा॥२९॥

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