अध्यात्मरामायण, अरण्यकाण्ड, तृतीय सर्ग (भाग-२)
*अध्यात्मरामायण*
*अरण्यकाण्ड*
*तृतीय सर्ग (भाग-२)*
*मुनिवर अगस्त्यजीसे भेंट*
*श्लोक संख्या २६ से ५० समाप्ति तक*
राजस अहंकारसे दस इन्द्रियाँ और सात्त्विक अहंकारसे इन्द्रियोंके अधिष्ठाता देवता तथा मन उत्पन्न हुए और इन सबसे मिलकर समष्टि-सूक्ष्म-शरीररूप हिरण्यगर्भ हुआ, जिसका दूसरा नाम सूत्रात्मा भी है॥२६॥
फिर स्थूल भूतसमूहसे विराट् उत्पन्न हुआ तथा विराट् पुरुषसे यह सम्पूर्ण स्थावर-जंगम संसार प्रकट हुआ॥२७॥
(हे जगदीश्वर!) काल और कर्मके क्रमसे आप ही देव, तिर्यक् और मनुष्य आदि योनियोंमें प्रकट हुए हैं। अपने मायिक गुणोंके भेदसे आप ही रजोगुणद्वारा जगत्कर्ता ब्रह्माजी, सत्त्वगुणद्वारा जगत्की रक्षा करनेवाले विष्णु और तमोगुणसे उसका लय करनेवाले भगवान् रुद्र हुए हैं; ऐसा विद्वान् पुरुष कहते हैं॥२८-२९॥
हे राम! बुद्धिके सत्त्व, रज और तम—इन तीन गुणोंसे ही प्राणीकी क्रमश: जाग्रत्, स्वप्न और सुषुप्ति—यह तीन अवस्थाएँ होती है, पर आप इन तीनोंसे सर्वथा पृथक्, इनके साक्षी, चित्स्वरूप और अविकारी है॥३०॥
हे रघुनन्दन! जिस समय आप सृष्टिरूपी लीलाका विस्तार करना चाहते हैं उस समय मायाको अंगीकार कर गुणवान्-से हो जाते हैं॥३१॥
हे राम! आपकी यह माया सदा विद्या और अविद्या दो रूपसे भासती है। जो लोग प्रवृत्ति-मार्गमें लगे रहते हैं वे अविद्याके वशीभूत हैं और जो वेदान्तार्थका विचार करनेवाले, निवृत्तिपरायण और आपकी भक्तिमें निरत हैं वे विद्यामय समझे जाते हैं। इनमेंसे जो अविद्याके वशीभूत हैं वे सदा जन्म-मरणरूप संसारमें फँसे रहते हैं और जो विद्याभ्यासी हैं वे ही नित्यमुक्त हैं॥३२-३३॥
संसारमें जो लोग आपकी भक्तिमें तत्पर और आपहीके मन्त्रकी उपासना करनेवाले होते हैं उन्हींके (अन्तःकरणमें) विद्याका प्रादुर्भाव होता है और किसीको नहीं॥३४॥
अतः जो पुरुष आपकी भक्तिसे सम्पन्न है वे निस्सन्देह मुक्त ही हैं, आपकी भक्तिरूप अमृतके बिना स्वप्नमें भी मोक्ष नहीं हो सकता॥३५॥
हे राम! और अधिक क्या कहूँ? इस विषयमें जो सार बात है वह तुम्हें बताये देता हूँ—संसारमें साधुसंग ही मोक्षका मुख्य कारण कहा गया है॥३६॥
संसारमें जो लोग सम्पद्-विपद्में समानचित्त, स्पृहारहित, पुत्र-वित्तादिकी इच्छाओंसे रहित, इन्द्रियोंका दमन करनेवाले, शान्तचित्त, आपके भक्त, सम्पूर्ण कामनाओंसे शून्य, इष्ट तथा अनिष्टकी प्राप्तिमें समान रहनेवाले, संगहीन, समस्त कर्मोंका त्याग करनेवाले, सर्वदा ब्रह्मपरायण रहनेवाले, यम आदि गुणोंसे सम्पन्न तथा जो कुछ मिल जाय उसीमें सन्तुष्ट रहनेवाले होते हैं वे ही साधु हैं। जिस समय ऐसे साधु पुरुषका संग होता है तो आपके कथा-श्रवणमें प्रेम हो जाता है॥३७-३९॥
हे राम! तदनन्तर आप सनातन पुरुषमें भक्ति हो जाती है तथा आपकी भक्ति हो जानेपर आपका स्फुट तथा प्रचुर ज्ञान प्राप्त होता है। यही चतुर जनसेवित मुक्तिका आद्य मार्ग है। अतः हे राघव! आपमें मेरी सर्वदा प्रेमलक्षणा उत्तम भक्ति बनी रहे और हे हरे! मुझे अधिकतर आपके भक्तोंका संग प्राप्त हो। हे नाथ! आज आपके दर्शनोंसे मेरा जन्म सफल हो गया॥४०-४२॥
हे प्रभो! आज मेरे सम्पूर्ण यज्ञ सफल हो गये। मैंने बहुत समयसे अनन्यभावसे तपस्या की है। हे राम! आज जो मैंने आपकी प्रत्यक्ष पूजा की यह उस तपस्याका ही फल है॥४३॥
हे राघव! सीताके सहित आप सर्वदा मेरे हृदयमें निवास करें; मुझे चलते-फिरते सदा आपका स्मरण बना रहे॥४४॥
लक्ष्मीपति श्रीरघुनाथजीकी इस प्रकार स्तुति कर मुनिश्रेष्ठ अगस्त्यजीने उन्हें पूर्वकालमें रामहीके लिये इन्द्रका दिया हुआ धनुष, बाणोंसे भरे हुए कभी खाली न होने वाले दो तरकश तथा एक रत्नजटित खड्ग दिया और कहा—"हे राघव! पृथिवीके भारस्वरूप राक्षसोंका संहार करो॥४५-४६॥
जिसके लिये आपने माया-मानव-रूपसे अवतार लिया है। यहाँसे दो योजनकी दूरीपर गौतमी नदीके किनारे पवित्र वनसे सुशोभित एक पंचवटी नामक आश्रम है। हे रघुनाथजी! आप अपना शेष काल वहीं व्यतीत करें। हे सत्पते! वहीं रहकर आप देवताओंके बहुत-से कार्य सिद्ध करें"॥४७-४९॥
तदनन्तर सर्वज्ञ भगवान् राम अगस्त्यजीका यह मनोहर भाषण और तत्त्वार्थगर्भित स्तोत्र सुन उनकी अनुमति लेकर प्रसन्नतापूर्वक उनके दिखाये हुए मार्गसे चले॥५०॥
*इति श्रीमदध्यात्मरामायणे उमामहेश्वरसंवादे अरण्यकाण्डे तृतीय: सर्ग:॥३॥*
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