अध्यात्मरामायण, अरण्यकाण्ड, पञ्चम सर्ग (भाग-१)

*अध्यात्मरामायण* 


*अरण्यकाण्ड* 


*पञ्चम सर्ग (भाग-१)* 


*शूर्पणखाको दण्ड, खर आदि राक्षसोंका वध और शूर्पणखाका रावणके पास जाना*


*श्लोक संख्या १ से ३१ तक*


*श्रीमहादेवजी बोले—*

(हे पार्वति!) उस समय उस घोर वनमें जनस्थानकी रहनेवाली एक महाबलवती इच्छानुसार रूप धारण करनेवाली राक्षसी घूमा करती थी॥१॥ 

एक दिन पंचवटीके पास गौतमी नदीके तीरपर जगत्पति श्रीरामचन्द्रजीके पद्म, वज्र और अंकुशकी रेखाओंसे युक्त चरण-चिह्नोंको देखकर वह उनके सौन्दर्यसे मोहित होकर कामासक्त हुई उन्हें देखती-देखती धीरे-धीरे रघुनाथजीके आश्रममें चली आयी॥२-३॥ 

वहाँ आकर कामदेवके समान अति सुन्दर लक्ष्मीपति श्रीरामचन्द्रजीको सीताजीके साथ बैठे देखकर वह कामातुरा राक्षसी रघुनाथजीसे बोली—"तुम किसके (पुत्र) हो? तुम्हारा क्या नाम है? इस आश्रममें जटा-वल्कलादि धारण कर क्यों रहते हो? यहाँ रहकर तुम क्या प्राप्त करना चाहते हो? सो मुझे बताओ॥४-५॥ 

मैं राक्षसराज महात्मा रावणकी बहिन कामरूपिणी राक्षसी शूर्पणखा हूँ॥६॥ 

मैं अपने भाई खरके साथ इसी वनमें रहती हूँ। राजाने मुझे इस सम्पूर्ण वनका अधिकार सौंप दिया है, (अतः) मैं मुनियोंको खाती हुई यहाँ रहती हूँ॥७॥ 

हे वक्ताओंमें श्रेष्ठ! मैं तुम्हारे विषयमें जानना चाहती हूँ अतः तुम मुझे (अपना नाम-धाम आदि) बताओ। तब भगवान्‌ने उससे कहा—"मैं अयोध्याधिपति राजा दशरथका राम नामक पुत्र हूँ॥८॥ 

यह सुन्दरी मेरी भार्या जनकनन्दिनी सीता है तथा वह अति सुन्दर कुमार मेरा छोटा भाई लक्ष्मण है॥९॥ 

हे त्रिभुवनसुन्दरि! बताओ मैं तुम्हारा क्या कार्य करूँ?" रामचन्द्रजीका यह वचन सुनकर कामातुरा शूर्पणखा बोली—॥१०॥ 

"राम! चलो (किसी) गिरि-गुहामें चलकर मेरे साथ आनन्द करो। इस समय मैं कामातुरा हूँ, अतः आप कमलनयनको छोड़ नहीं सकती"॥११॥

तब रामचन्द्रजीने नेत्रोंसे सीताजीकी ओर संकेत करके मुसकराकर कहा—"हे सुंदरि! मेरी तो यह भार्या मौजूद है, जिसको त्यागना असम्भव है॥१२॥ 

(इसके रहते हुए) तुम जन्मभर सौतकी डाहसे जलती हुई किस प्रकार रह सकोगी? बाहर मेरा अत्यन्त सुन्दर छोटा भाई लक्ष्मण विराजमान है॥१३॥ 

वह तुम्हारा योग्य पति होगा, तुम उसीके साथ (वन-पर्वतादिमें) विहार करो।" रामचन्द्रजीके इस प्रकार कहनेपर कामसे मोहिता भयंकरी शूर्पणखाने लक्ष्मणजीसे (जाकर) कहा—"हे सुन्दर! अपने भाईकी आज्ञा मानकर तुम मेरे पति हो जाओ। आज हम और तुम परस्पर संगमन करें, देरी न करो"॥१४-१५॥

(उस राक्षसीने जब लक्ष्मणजीसे इस प्रकार कहा तो) वे उससे बोले—"साध्वि! मैं तो उन बुद्धिमान् (भगवान्) रामका दास हूँ। मुझे अपना पति बनानेसे तुम्हें भी उनकी दासी बनना पड़ेगा। तुम्हारे लिये इससे अधिक दु:खकी और क्या बात होगी?॥१६॥ 

तुम्हारा कल्याण हो, तुम उन्हींके पास जाओ, वे महाराज सबके स्वामी हैं।" यह सुनकर वह दुष्टचित्ता राक्षसी फिर रघुनाथजीके पास आयी॥१७॥ 

और क्रोधपूर्वक बोली—"हे राम! तुम बड़े चंचलचित्त हो, मुझे क्यों इधर-उधर घूमा रहे हो? मैं अभी तुम्हारे सामने ही इस सीताको खाये जाती हूँ"॥१८॥

ऐसा कह वह विकट रूप धारण कर जानकीजीकी ओर दौड़ी। तब लक्ष्मणजीने रामचन्द्रजीकी आज्ञासे उसे पकड़कर बड़ी फुर्तीसे खड्ग लेकर उसके नाक-कान काट डाले। तदनन्तर वह घोर शब्द करती हुई रुधिरमें लथपथ हो बड़ी शीघ्रतासे जाकर रोती और कठोर शब्द करती खरके सामने गिर पड़ी। उसे देखकर तीक्ष्ण ध्वनिवाले खरने कहा—"यह क्या बात है॥१९-२१॥ 

अरी! मृत्युके मुखमें जानेवाले किस दुष्टने तेरी यह दशा की है? तू बतला तो सही, वह कालके समान भी बलि क्यों न हो, मैं उसे क्षणभरमें ही मार डालूँगा"॥२२॥

तब राक्षसी शूर्पणखाने उससे कहा—"यहाँ सीता और लक्ष्मणके सहित राम दण्डकारण्यको निर्भय करता हुआ गोदावरीके तटपर रहता है॥२३॥ 

उसीकी प्रेरणासे उसके भाई लक्ष्मणने मेरी यह गति की है। यदि तुम बड़े कुलीन और वीर हो तो उन दोनों शत्रुओं को मार डालो॥२४॥ 

तुम उन दोनों मदोंन्मत्तोंको खा जाओ और मैं उन दोनोंका रुधिर पीऊँगी। नहीं तो अपने प्राणोंको छोड़कर यमलोकको चली जाऊँगी"॥२५॥

शूर्पणखाका यह कथन सुनकर खर क्रोधसे परिपूर्ण हो तुरंत (युद्धके लिये) चला और रामको मारनेके लिये उसने बड़े पराक्रमी चौदह सहस्र राक्षस उनके पास भेजे। खर-दूषण और त्रिशिरा—ये सभी नाना प्रकारके अस्त्र-शस्त्र लेकर रामके पास आये। उनका कोलाहल सुन श्रीरामचन्द्रजीने लक्ष्मणजीसे कहा—॥२६-२८॥ 

("लक्ष्मण! देखो) बङा कोलाहल सुनायी पड़ रहा है, मालूम होता है निश्चय ही राक्षसगण आ रहे हैं; अवश्य ही आज मेरे साथ उनका घोर युद्ध होगा॥२९॥ 

अतः हे महाबल! तुम सीताको लेकर किसी पर्वतकी कन्दरामें चले जाओ। आज मैं इन समस्त घोररूप राक्षसोंका वध करना चाहता हूँ॥३०॥ 

तुम्हें मेरी सौगन्ध है, इस विषयमें तुम और कुछ न कहना।" तब लक्ष्मणजी 'जो आज्ञा' कह सीताजीको लेकर एक गिरिगुहामें चले गये॥३१॥

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