अध्यात्मरामायण, अरण्यकाण्ड, सप्तम सर्ग (भाग-२)

*अध्यात्मरामायण* 


*अरण्यकाण्ड* 


*सप्तम सर्ग (भाग-२)* 


*मारीचवध और सीताहरण*


*श्लोक संख्या ३५ से ६६ समाप्ति तक*


ऐसा कहकर वे अपनी भुजाओंसे छाती पीटती हुई रोने लगीं। उनके ऐसे कठोर शब्द सुन लक्ष्मणजीने अति दुःखित हो अपने दोनों कान मूँद लिये और कहा—"हे चण्डि! तुम्हें धिक्कार है, तुम मुझे ऐसी बातें कह रही हो! इससे तुम नष्ट हो जाओगी।" ऐसा कह लक्ष्मणजी सीताको वनदेवियोंको सौंपकर दुःखसे अत्यन्त खिन्न हो धीरे-धीरे रामके पास चले॥३५-३६½॥ 

इसी समय मौका समझकर रावण भिक्षुका वेष बना दण्ड-कमण्डलुके सहित सीताके पास आया। सीताने उसे देखकर तुरंत ही प्रणाम किया और भक्तिपूर्वक उसका पूजन कर कन्द-मूल-फल आदि देकर स्वागत करते हुए कहा—"हे मुने! ये फल आदि खाकर सुखपूर्वक विश्राम कीजिये। अभी थोड़ी देरमें ही मेरे पतिदेव आते होंगे। यदि आपकी इच्छा हो तो कुछ देर ठहरिये। वे आपका कुछ विशेष सत्कार कर सकेंगे"॥३७-४०॥

*भिक्षु बोला—*

हे कमललोचने! तुम कौन हो? तुम्हारे पति कौन हैं; हे अनघे! इस राक्षससेवित वनमें तुम क्यों रहती हो; हे कल्याणि! ये सब बातें बताओ, तब मैं भी तुम्हें अपना सारा वृत्तान्त सुनाऊँगा॥४१॥ 

*सीताजी बोलीं—*

(हे भिक्षो!) श्रीमान् महाराज दशरथ अयोध्याके राजा थे, उनके ज्येष्ठ पुत्र सर्वसुलक्षणसम्पन्न राम हैं॥४२॥ 

मैं जनकनन्दिनी सीता उन्हींकी धर्मपत्नी हूँ। उनका छोटा भाई लक्ष्मण है। वह अपने भाईका अत्यन्त स्नेही है॥४३॥ 

(हम दोनोंके साथ) श्रीरामचन्द्रजी पिताकी आज्ञासे चौदह वर्ष दण्डकारण्यमें रहनेके लिये आये हैं। अब मैं आपके विषयमें जानना चाहती हूँ, आप भी मुझे अपना परिचय दें॥४४॥

*भिक्षु बोला—* 

मैं पुलस्त्यनन्दन विश्रवाका पुत्र राक्षसराज रावण हूँ। मैं तुम्हें पानेकी इच्छासे सन्तप्त हूँ; अतः इस समय तुम्हें अपनी राजधानीमें ले जानेके लिये यहाँ आया हूँ॥४५॥ 

उस मुनिवेषधारी रामसे तुम्हें क्या मिलेगा। तुम मुझसे प्रेम करो और इस वनवासके दुःखोंसे छूटकर मेरे साथ नाना प्रकारके भोग भोगो॥४६॥ 

उसके ये वचन सुनकर सीताजीने कुछ डरते हुए उससे कहा—"यदि तू मुझसे ऐसी बात कहेगा तो रामचन्द्रजी तुझे नष्ट कर देंगे॥४७॥ 

जरा ठहर तो, भाईके सहित श्रीरामचन्द्रजी अभी आते होंगे! मेरे साथ कौन बलका प्रयोग कर सकता है; क्या सिंह-पत्नीके साथ खरहा भी बलप्रयोग कर सकता है॥४८॥ 

रामजीके बाणोंसे छिन्न-भिन्न होकर तू अभी पृथिवीतलपर सोवेगा।" सीताजीके ऐसे वचन सुनकर रावणने क्रोधाकुल हो अपना महापर्वताकार रूप दिखलाया, जिसके दस मुख और बीस भुजाएँ थीं तथा जिसकी काले मेघके समान आभा थी॥४९-५०॥ 

उस भयंकर रूपको देखकर वनदेवियाँ और वन्य जीव भयभीत हो गये। तब रावणने (सीताजीके पैरोंके नीचेकी) पृथिवीको नखोंसे खोदकर उन्हें अपने हाथोंसे उठा लिया और रथमें डालकर तुरंत आकाशमार्गसे चल दिया॥५१½॥

उस समय सीताजी अति भयभीतचित्त होकर दीन दृष्टिसे पृथिवीकी ओर देखती हुई 'हा राम! हा लक्ष्मण!' ऐसा कहकर रोने लगीं। सीताजीका वह आर्तक्रन्दन सुनकर तुरंत ही तीखी चोंचवाला पक्षिश्रेष्ठ जटायु पहाड़की चोटीपरसे उठा और बोला—"अरे! ठहर, ठहर, यज्ञके मन्त्रपूत पुरोडाशको ले जानेवाले कुत्तेके समान मेरे सामने ही जगन्नाथ श्रीरघुनाथजीकी भार्याको सूने तपोवनसे तू कौन लिये जाता है?"॥५२-५५॥ 

जटायुने ऐसा कहकर अपनी तीक्ष्ण चोंचसे रावणके रथको चूर-चूर कर डाला और अपने पंजोंसे घोड़ोको मारकर उसके धनुषके टुकड़े-टुकड़े कर दिये॥५६॥ 

तब रावणने सीताजीको छोड़कर अपना खड्ग निकाला और झुँझलाकर मतिमान् जटायुके पंख काट डाले॥५७॥ 

पंख कट जानेसे पक्षिराज जटायु अधमरे होकर पृथिवीपर गिर पड़े। फिर तुरंत ही रावण सीताजीको दूसरे रथपर चढ़ाकर चलता बना॥५८॥

उस समय वह सीता किसी रक्षकको न देखकर बारम्बार रामको पुकारती हुई रो-रोकर कह रही थी—"हा राम! हा जगन्नाथ! क्या आप मुझ दुःखिनीको नहीं देखते॥५९॥ 

हे राघव! आपकी भार्याको राक्षस लिये जाता है, आप छुङाइये। हा महाभाग लक्ष्मण! मुझ अपराधिनीकी रक्षा करो॥६०॥ 

हे देवर! मैंने तुम्हें वाग्बाण मारे थे, तुम मुझे क्षमा करना।" सीताजीके इस प्रकार रुदन करनेसे रामके आनेकी आशंका करता हुआ रावण उन्हें लेकर वायुके समान अति तीव्र वेगसे चलने लगा॥६१½॥

इस प्रकार आकाशमार्गसे जाते हुए नीचेकी ओर देखती हुई कमलानना सीताजीने एक पर्वत-शिखरपर पाँच वानरोंको बैठे देखा। यह देखकर उन्होंने अपने आभूषणादि उतारकर अपने दुपट्टेके टुकड़ेमें बाँधे और 'ये रामको मेरा समाचार सुनावें' इस अभिप्रायसे पर्वतपर फेंक दिये॥६२-६३½॥ 

तदनन्तर रावणने समुद्र पारकर लंकामें पहुँचकर उन्हें अपने अन्तःपुरके एकान्त देश अशोकवनमें रखा और राक्षसियोंसे घेरे रखकर मातृबुद्धिसे उनकी रक्षा करने लगा॥६४-६५॥ 

उस स्थानमें अति कृश और दीनवदना सीताजी सब प्रकारका शृंगार छोड़कर दुःखके कारण शुष्कवदन और अत्यन्त विह्वल होकर 'हा राम! हा राम!' ऐसे विलाप करती हुई राक्षसोंके बीचमें रहने लगीं॥६६॥

*इति श्रीमदध्यात्मरामायणे उमामहेश्वरसंवादे अरण्यकाण्डे सप्तमः सर्गः॥७॥*

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