अध्यात्मरामायण, अरण्यकाण्ड, सप्तम सर्ग (भाग-१)
*अध्यात्मरामायण*
*अरण्यकाण्ड*
*सप्तम सर्ग (भाग-१)*
*मारीचवध और सीताहरण*
*श्लोक संख्या १ से ३४ तक*
*श्रीमहादेवजी बोले—*
(हे पार्वति!) इधर रामचन्द्रजीने भी रावणका सारा षड्यन्त्र जानकर एकान्तमें श्रीजानकीजीसे कहा—"हे सीते! मैं जो कुछ कहता हूँ वह सुनो॥१॥
हे शुभे! रावण तुम्हारे पास भिक्षुका रूप धारण करके आयेगा, अतः तुम अपने ही समान आकृतिवाली अपनी छायाको कुटीमें छोड़कर अग्निमें प्रवेश कर जाओ और मेरी आज्ञासे वहाँ अदृश्यरूपसे एक वर्ष रहो। तदनन्तर रावणके मारे जानेपर तुम मुझे पूर्ववत् पा लोगी"॥२-३॥
रामचन्द्रजीके वचन सुनकर सीताजीने भी वैसा ही किया। वे मायामयी सीताको बाहर कुटीमें छोड़कर स्वयं अग्निमें अन्तर्धान हो गयीं॥४॥
तब उस मायासीताने मायामय मृगको देखकर श्रीरामचन्द्रजीके पास आकर हँसते हुए बड़ी नम्रतासे कहा—॥५॥
"हे राम! यह रत्न-विभूषित विचित्र सुवर्ण-मृग देखिये। (अहो!) इसके शरीरमें कैसे अद्भुत बिन्दु हैं और यह कैसी निर्भयतासे विचर रहा है? हे प्रभो! आप इसे बाँधकर मुझे ला दीजिये; यह सुन्दर हरिण मेरा क्रीड़ामृग हो"॥६॥
तब रामचन्द्रजीने 'बहुत अच्छा' कह अपना धनुष उठा लिया और जाते समय लक्ष्मणजीसे कहा—"लक्ष्मण! तुम प्राण-प्रिया सीताकी यत्नपूर्वक रक्षा करना॥७॥
वनमें बड़े मायावी भयंकर राक्षस विचर रहे हैं। अतः तुम अनिन्दिता साध्वी सीताकी बहुत सावधान रहकर रक्षा करना"॥८॥
तब लक्ष्मणजीने श्रीरामचन्द्रजीसे कहा—"देव! वह मृगरूपधारी मारीच है, इसमें सन्देह नहीं; क्योंकि भला मृग ऐसा कहाँ हो सकता है?"॥९॥
*श्रीरामचन्द्रजी बोले—*
यदि यह मारीच है तो इसमें सन्देह नहीं, मैं इसे अवश्य मार डालूँगा और यदि मृग ही है तो सीताका मन रखनेके लिये ले आऊँगा॥१०॥
मैं अभी जाकर बहुत शीघ्र ही इस मृगको बाँधकर लिये आता हूँ, तबतक तुम सीताकी रखवाली करते हुए बहुत सावधान रहना॥११॥
यह विश्वप्रपंचरूपिणी जगन्मोहिनी माया जिनके आश्रित है वे रामचन्द्रजी ऐसा कह उस मायामृगके पीछे दौड़ते चले गये॥१२॥
वे निर्विकार चिदात्मा और सर्वव्यापक होकर भी उस मृगके पीछे दौड़े, इससे यह वाक्य सर्वथा सत्य ही है कि 'भगवान् हरि बड़े भक्तवत्सल हैं'॥१३॥
भगवान् सब कुछ जानते थे, तथापि सीताजीको प्रसन्न करनेके लिये वे मृगके पीछे गये। नहीं तो पूर्णकाम आत्मज्ञ भगवान् रामको मृग अथवा स्त्रीसे क्या काम था; वह मृग कभी तो पास ही दिखलायी देने लगता, कभी एक क्षणमें ही दूर भागकर छिप जाता और फिर बहुत दूरीपर दिखलायी देता। इस प्रकार वह रामचन्द्रजीको बहुत दूर ले गया॥१४-१५½॥
तब रामचन्द्रजीने यह निश्चयपूर्वक जानकर कि यह राक्षस ही है, उस मृगरूप राक्षसको एक बाण छोड़कर बींध डाला। बाणके लगते ही मारीच अपना पूर्वरूप धारणकर लोहूभरे मुखसे पृथिवीपर गिर पड़ा॥१६-१७॥
वह रक्तपायी (राक्षस) रामकी-सी बोलीमें यह कहता हुआ कि 'हे महाबाहो लक्ष्मण! मैं मारा गया; मेरी शीघ्र ही रक्षा करो'—पृथिवीपर गिरा॥१८॥
मरण-समयमें जिनके नामका स्मरण करनेसे अज्ञजन भी जिनमें लीन हो जाते हैं उन्हीं हरिको देखते-देखते उन्हींके हाथसे मरे हुए उस राक्षसके विषयमें तो कहना ही क्या है?॥१९॥
उसके शरीरसे निकला हुआ तेज सबके देखते-देखते श्रीराममें ही समा गया। यह देखकर देवताओंको बड़ा आश्चर्य हुआ॥२०॥
वे कहने लगे—("अहो!) इस मुनिजनहिंसक पापी निशाचरने कैसे-कैसे कुकर्म किये और फिर कैसी शुभ गति प्राप्त की। निस्सन्देह यह श्रीरघुनाथजीकी ही महिमा है॥२१॥
रामके बाणसे बींधे जानेपर यह पहलेसे ही भयसे अपना सब गृह और धन आदि छोड़ रामचन्द्रजीके स्मरणमें लगा हुआ था॥२२॥
निरन्तर रामका ध्यान करनेसे इसके सारे पाप नष्ट हो गये थे तथा अन्तमें यह रामको देखते-देखते उन्हींके हाथसे मारा भी गया; इसलिये इसने रामहीको प्राप्त कर लिया॥२३॥
जो श्रीरामका स्मरण करते हुए शरीर छोड़ते हैं, वे ब्राह्मण हों या राक्षस, पापी हों या धार्मिक—परम पदको ही प्राप्त होते हैं"। परस्पर इस प्रकार कहते हुए फिर देवगण स्वर्गको चले गये॥२४½॥
तब रामचन्द्रजी सोचने लगे कि 'इस अधम राक्षसने मरते समय मेरी-सी बोलीमें 'हा लक्ष्मण!' कहकर प्राण क्यों छोड़े? इन मेरे-से वाक्योंको सुनकर सीताकी क्या दशा होगी? इस प्रकार चिन्ता करते हुए राम बड़ी दूरसे लौटे॥२५-२६½॥
इधर सीताने दुरात्मा मारीचका वह शब्द सुनकर अत्यन्त भय और दुःखसे व्याकुल हो लक्ष्मणसे यों कहा—"लक्ष्मण! तुम बहुत शीघ्र जाओ, तुम्हारे भाई राक्षसोंसे कष्ट पा रहे हैं। क्या तुम अपने भाईका 'हा लक्ष्मण' यह वाक्य नहीं सुनते?" लक्ष्मणजीने कहा—"देवि! यह वाक्य श्रीरामचन्द्रजीका नहीं है॥२७-२९॥
किसी राक्षसने मरते-मरते ये वचन कहे हैं। जो रामजी क्रोधित होनेपर एक क्षणमें सम्पूर्ण त्रिलोकीको भी नष्ट कर सकते हैं। वे देववन्दित प्रभु भला ऐसा दीन वचन कैसे बोल सकते हैं?"॥३०½॥
तब सीताजीने नेत्रोंमें जल भरकर क्रोधपूर्वक लक्ष्मणजीकी ओर देखते हुए कहा—"रे लक्ष्मण! क्या तू अपने भाईको विपत्तिमें पड़े देखना चाहता है? अरे दुर्बुद्धे! मालूम होता है, तुझे रामका नाश चाहनेवाले भरतने ही भेजा है॥३१-३२॥
क्या तू रामके नष्ट हो जानेपर मुझे ले जानेके लिये ही आया है, किन्तु तू मुझे नहीं पावेगा। देख मैं अभी प्राण त्याग किये देती हूँ॥३३॥
राम तुझे इस प्रकार पत्नीहरणके लिये उद्यत नहीं जानते हैं। रामके अतिरिक्त मैं भरत या तुझे किसीको भी नहीं छू सकती"॥३४॥
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