अध्यात्मरामायण, अरण्यकाण्ड, द्वितीय सर्ग

 *अध्यात्मरामायण* 


*अरण्यकाण्ड*


*द्वितीय सर्ग*


*शरभंग तथा सुतीक्ष्ण आदि मुनीश्वरोंसे भेंट*


*श्रीमहादेवजी बोले—*

हे पार्वति! विराधके स्वर्ग सिधारनेपर श्रीरामचन्द्रजी लक्ष्मण और सीताजीके साथ शरभंग मुनिके सर्वसुखदायक तपोवनको गये॥१॥ 

मतिमान् शरभंग श्रीरामचन्द्रजीको सीता और लक्ष्मणके सहित आते देख सहसा उठ खड़े हुए॥२॥ 

और आगे बढ़कर उनकी भली प्रकार पूजा कर उनको आसनपर बैठाया तथा कन्द-मूल-फलादिसे उनका आतिथ्य-सत्कार किया॥३॥ 

तदनन्तर मुनिवर शरभंगने भक्तवत्सल भगवान् रामसे प्रीतिपूर्वक कहा—"मैं बहुत कालसे आपके दर्शनोंकी आकांक्षासे तपस्याका निश्चय कर यहीं रहता हूँ। हे राम! आप साक्षात् परमेश्वर हैं। मुझे तपस्याके द्वारा बहुत-सा पुण्य प्राप्त हुआ है वह सब आज आपको समर्पितकर मैं मोक्षपदको प्राप्त करूँगा"॥४-५॥ 

ऐसा कह महाविरक्त योगिवर शरभंग अपना महान् पुण्य-फल श्रीरामचन्द्रजीको समर्पणकर सीताके सहित अप्रमेय (भगवान्) रामको प्रणामकर सहसा चितापर चढ़ गये॥६॥

उस समय वे (मन-ही-मन) सर्वान्तर्यामी दूर्वादलके समान श्यामवर्ण, कमलनयन, चीराम्बरधारी, स्निग्धजटाजूटधारी श्रीरामचन्द्रजीका सीता और लक्ष्मणके सहित बहुत देरतक ध्यान करते रहे॥७॥ 

(फिर मन-ही-मन कहने लगे—) "अहो! इस संसारमें श्रीरघुनाथजीको छोड़कर स्मरण करनेपर कामनाओंको पूर्ण करनेवाला और कौन दयालु है? मैं अनन्य भावसे उनका नित्य स्मरण करता था, अत: मेरे स्मरणको जानकर वे स्वयं ही चले आये॥८॥ 

देवेश दशरथनन्दन भगवान् राम मेरी ओर देखते रहें, मैं अपना शरीर जलाकर अब निष्पाप होकर ब्रह्मलोकको जा रहा हूँ॥९॥ 

मेरे हृदयमें सर्वदा अयोध्याधिपति श्रीरामचन्द्रजी विराजमान रहें, जिनके वामांकमें मेघमें बिजलीके समान श्रीसीताजी विराजमान हैं"॥१०॥ 

इस प्रकार रामचन्द्रजीका बहुत देरतक ध्यान करते हुए तथा अपने सम्मुख विराजमान उनके स्वरूपको देखते हुए मुनिवर शरभंगने अग्नि प्रज्वलितकर अपना पांचभौतिक शरीर जला डाला तथा दिव्य देह धारणकर साक्षात् ब्रह्मलोकको चले गये॥११½॥ 

तदनन्तर दण्डकारण्यवासी समस्त मुनिगण श्रीरघुनाथजीका दर्शन करनेके लिये शरभंग मुनिके आश्रमपर आये॥१२॥ 

उस मुनि-समाजको देखकर माया-मानव-रूप श्रीराम, सीता और लक्ष्मणने सहसा पृथिवीपर सिर रखकर उन्हें प्रणाम किया॥१३॥ 

उन मुनीश्वरोंने सर्वान्तर्यामी भगवान् रामका आशीर्वादद्वारा अभिनन्दन किया और फिर वे धनुर्बाणधारी श्रीहरिसे हाथ जोड़कर बोले—१४॥ 

"आपने ब्रह्माकी प्रार्थनासे पृथिवीका भार उतारनेके लिये अवतार लिया है। हम यह जानते हैं कि आप साक्षात् श्रीहरि, जानकीजी लक्ष्मी, लक्ष्मणजी शेषजीका अंश और भरत-शत्रुघ्न भगवान्‌के शंख और चक्र हैं। इसलिये आप यहाँ सबसे पहले ऋषियोंका दु:ख दूर करें॥१५-१६॥ 

हे रघुश्रेष्ठ! आइये, सीता और लक्ष्मणसहित आप हमारे साथ क्रमशः मुनीश्वरोंके समस्त आश्रमोंको देखनेके लिये चलिये। ऐसा करनेसे आपको हमपर बड़ी दया आयेगी"॥१७॥ 

इस प्रकार हाथ जोड़कर निवेदन किये जानेपर भगवान् राम मुनियोंके साथ उनके तपोवनोंको देखनेके लिये चले॥१८॥ 

वहाँ उन्होंने सब ओर बहुत-सी खोपड़ियाँ पड़ी देखीं। उन्हें देखकर श्रीरामचन्द्रजीने मुनियोंसे पूछा—॥१९॥ 

"ये हड्डियाँ किनकी हैं और (इस तपोभूमिमें) कैसे पड़ी हैं?" तब मुनीश्वरोंने कहा—"हे राम! ये ऋषियोंके मस्तक हैं॥२०॥ 

हे समर्थ! इन्हें राक्षसोंने खा लिया है, वे राक्षस समाधिमें मग्न रहनेके कारण भागनेमें असमर्थ मुनीश्वरोंको भक्षण करनेके लिये मौका देखते हुए जहाँ-तहाँ घूमते रहते हैं "॥२१॥ 

मुनियोंके ये भय और दीनतापूर्ण वचन सुनकर श्रीरामचन्द्रजीने समस्त राक्षसोंका वध करनेके लिये प्रतिज्ञा की॥२२॥ 

इस प्रकार क्रमशः मुनीश्वरोंके आश्रम देखते हुए प्रभु श्रीरघुनाथजी वनवासी मुनियोंद्वारा नित्य पूजित होते हुए सीता और लक्ष्मणके साथ वहाँ कुछ वर्ष रहे॥२३-२४॥ 

तदनन्तर वे सुविख्यात सुतीक्ष्ण मुनिके आश्रममें गये जो ऋषियोंसे भरा हुआ, समस्त ऋतुओंके गुणोंसे युक्त और सब समय सुखदायक था॥२५॥ 

रामका आगमन सुनकर राम-मन्त्रके उपासक और अगस्त्यके शिष्य सुतीक्ष्ण (उन्हें लेनेके लिये) स्वयं आगे आये और उनकी विधिवत् पूजा की। उस समय सुतीक्ष्णके नेत्र भक्तिवश भगवद्दर्शनके लिये अति उतावले हो रहे थे॥२६॥ 

*सुतीक्ष्ण बोले—*

हे अनन्त-गुण अप्रमेय सीतापते! मैं आपका ही मन्त्र जपता हूँ। हे अभिराम राम! शिव और ब्रह्मा आपके चरणोंके आश्रित हैं, आपके चरण संसार-सागरसे पार करनेके लिये सुदृढ़ पोत (जहाज) हैं! हे नाथ! मैं सर्वदा आपके दासोंका दास हूँ॥२७॥ 

आप समस्त संसारकी इन्द्रियोंके अविषय हैं, तथापि इस मल-मूत्रके पुतले शरीरके मोहपाशमें जिनका हृदय बँधा हुआ है ऐसे मुझ दीनको अपनी ही मायासे मोहित होकर पुत्र-कलत्र और गृह आदिके अन्धकूपमें पड़ा देखकर आप स्वयं ही (मुझे अपना पुण्य-दर्शन देनेके लिये) पधारे हैं!॥२८॥ 

आप समस्त प्राणियोंके हृदयमें विराजमान हैं, तथापि जो लोग आपके मन्त्रजापसे विमुख हैं उन्हें आप अपनी मायासे मोहित करते हैं और जो उस मन्त्रके जापमें तत्पर हैं उनकी माया दूर हो जाती है। इस प्रकार राजाके समान आप सबको उनकी सेवाके अनुसार फल देनेवाले हैं॥२९॥ 

हे ईश! वास्तवमें एकमात्र आप ही इस विश्वकी उत्पत्ति, स्थिति और प्रलयके कारण होते हुए त्रिगुणमयी मायाके कारण ब्रह्मा, विष्णु और महादेवके रूपोंमें भासते हैं; आप ही मुग्धचित्त पुरुषोंकी (दृष्टिमें) (मनुष्य, पशु पक्षी आदि) नाना प्रकार की आकृतियोंसे प्रतीत हो रहे हैं, जिस प्रकार जलके पात्रोंमें प्रतिबिम्बित होनेसे सूर्य अनेक होकर भासता है॥३०॥ 

हे राम! आप अज्ञान से सर्वथा परे हैं तथापि आपके चरण-कमलोंको आज मैं प्रत्यक्ष देख रहा हूँ। (इससे विदित होता है कि) सबके साक्षी होनेसे आप असत्पुरुषोंको अगोचर होकर भी जिनका चित्त आपके मन्त्रजापसे शुद्ध हो गया है उनपर सदा प्रसन्न रहते हैं॥३१॥ 

हे राम! आप रूपरहित हैं, तथापि अपने ही माया-विलाससे धारण किये आपके मनोहर मनुष्यवेषधारी स्वरूपको मैं देख रहा हूँ। आपका यह रूप करोड़ों कामदेवोंके समान कान्तिमान् है और कमनीय धनुर्बाण धारण किये हैं। आपका हृदय दयार्द्र तथा मुख मुसकानसे मनोहर है॥३२॥ 

जो सीताजीसे युक्त हैं, मृगचर्म धारण किये हैं, सर्वथा अजेय हैं, जिनके चरण-कमल नित्य श्रीसुमित्रानन्दनसे सेवित हैं और जिनकी नीलकमलके समान आभा है उन अनन्तगुणसम्पन्न अत्यन्त शान्त मेरा सौभाग्यस्वरूप श्रीराममूर्तिको मैं अहर्निश प्रणाम करता हूँ॥३३॥ 

हे राम! जो लोग आपके स्वरूपको देश-काल आदि समस्त उपाधियोंसे रहित और चिद्घन प्रकाशस्वरूप जानते हैं, वे भले ही वैसा ही जानें; किन्तु मेरे हृदयमें तो, आज जो प्रत्यक्षरूपसे मुझे दिखायी दे रहा है, यही रूप भासमान होता रहे। इसके अतिरिक्त मुझे और किसी रूपकी इच्छा नहीं है॥३४॥ 

सुतीक्ष्णके इस प्रकार स्तुति करनेपर श्रीरामचन्द्रजीने उनसे मुसकराकर कहा—"हे मुने! मैं यह जानता हूँ कि तुम्हारा चित्त मेरी उपासनासे निर्मल हो गया है॥३५॥ 

और तुम्हारा मेरे अतिरिक्त और कोई साधन नहीं है, इसलिये मैं तुम्हें देखनेके लिये आया हूँ। संसारमें जो लोग मेरे मन्त्रकी उपासना करते हैं और मेरी ही शरणमें रहते हैं॥३६॥ 

तथा नित्य निरपेक्ष और अनन्यगति रहते हैं, उन्हें मैं नित्यप्रति दर्शन देता हूँ। जो व्यक्ति तुम्हारे किये हुए इस मेरे प्रिय स्तोत्रका पाठ करता है॥३७॥ 

उसे मेरी शुद्ध भक्ति और निर्मल ज्ञान प्राप्त होता है, तुम केवल मेरी उपासनासे इस जीवितावस्थामें ही सर्वथा मुक्त हो गये हो॥३८॥ 

शरीर छूटनेपर तुम निस्सन्देह मेरा सायुज्यपद प्राप्त करोगे। अब मैं तुम्हारे गुरु मुनिश्रेष्ठ अगस्त्यजीसे मिलना चाहता हूँ; मेरा चित्त उनके पास कुछ दिन रहनेके लिये उतावला हो रहा है"॥३९॥

*सुतीक्ष्णने कहा—*

"हे राघव! बहुत अच्छा, वहाँ कल चलियेगा। मैंने भी मुनीश्वरको बहुत दिन हुए तब देखा था। अत: मैं भी आपके साथ ही वहाँ चलूँगा"॥४०॥ 

प्रात:काल होनेपर सीता और लक्ष्मणके सहित श्रीरामचन्द्रजी सुतीक्ष्ण मुनिको लेकर अगस्त्यजीसे वार्तालाप करनेके लिये उत्कण्ठित हो शने:-शने: उनके छोटे भाई (अग्निजिह्व मुनि)-के आश्रमकी ओर चले॥४१॥


*इति श्रीमदध्यात्मरामायणे उमामहेश्वरसंवादे अरण्यकाण्डे द्वितीय: सर्ग:॥२॥*

Comments

Popular posts from this blog

अध्यात्मरामायण, अरण्यकाण्ड, चतुर्थ सर्ग (भाग-२)

अध्यात्मरामायण, अरण्यकाण्ड, पञ्चम सर्ग (भाग-२)

अध्यात्मरामायण, अरण्यकाण्ड, दशम सर्ग