अध्यात्मरामायण, अरण्यकाण्ड, तृतीय सर्ग (भाग-१)

*अध्यात्मरामायण* 


*अरण्यकाण्ड* 


*तृतीय सर्ग (भाग-१)* 


*मुनिवर अगस्त्यजीसे भेंट*


*श्लोक संख्या १ से २५ तक*


*श्रीमहादेवजी बोले—* 

(हे पार्वति!) (उस दिन) मध्याह्नके समय श्रीरामचन्द्रजी सुतीक्ष्ण, सीता और लक्ष्मणके साथ अगस्त्य मुनिके छोटे भाई (अग्निजिह्व मुनि)-के आश्रममें पहुँचे॥१॥ 

उन्होंने उनकी भली प्रकार पूजा की (फिर उनके दिये हुए) कन्द-मूल-फल आदि खाकर, दूसरे दिन प्रातःकाल उठते ही अगस्त्य मुनिके आश्रमको चले॥२॥

वह आश्रम समस्त ऋतुओंके फल और पुष्पोंसे परिपूर्ण, विविध वन्य पशुओंसे सेवित तथा नाना प्रकारके पक्षियोंसे गुंजायमान नन्दन वनके समान (सुशोभित) था॥३॥ 

वह ब्रह्मर्षियों और देवर्षियोंसे सेवित था तथा उसके चारों ओर उन ऋषियोंके आश्रम सुशोभित थे। इस प्रकार वह साक्षात् दूसरे ब्रह्मलोकके समान जान पड़ता था॥४॥

आश्रमके बाहर रहकर श्रीरामचन्द्रजीने सुतीक्ष्ण मुनिसे कहा—"हे सुतीक्ष्ण! तुम शीघ्र ही मुनिवर अगस्त्यजीके पास जाकर उन्हें सीता और लक्ष्मणके सहित मेरे आनेकी सूचना दो।" तब सुतीक्ष्ण 'बड़ी प्रसन्नताकी बात है' ऐसा कह शीघ्रतासे गुरुजीके आश्रममें गये। वहाँ जाकर सुतीक्ष्णने देखा कि मुनिश्रेष्ठ अगस्त्य मुनिमण्डलीसे— विशेषतया रामभक्तोंसे घिरे हुए बैठे हैं और अत्यन्त भक्तिपूर्वक अपने शिष्योंको राममन्त्रकी व्याख्या सुना रहे हैं। यह देखकर सुतीक्ष्ण उनके पास गये॥५-८॥ 

उन्हें विनयपूर्वक दण्डवत् प्रणामकर सुबुद्धि सुतीक्ष्णने कहा—"ब्रह्मन्! दशरथकुमार श्रीराम सीता और लक्ष्मणके साथ आपके दर्शनोंके लिये आये हैं और अंजलि बाँधे आश्रमके बाहर खड़े हैं"॥९॥

*अगस्त्यजी बोले—*

वत्स! तुम्हारा कल्याण हो। तुम शीघ्र ही मेरे हृदयस्थित (भगवान्) रामको ले आओ। मैं उनके दर्शनोंकी इच्छासे उन्हींका ध्यान करता हुआ यहाँ रहता हूँ॥१०॥ 

ऐसा कह वे शीघ्र ही मुनियोंके साथ उठकर स्वयं श्रीरामचन्द्रजीके पास आये और उनसे अत्यन्त भक्तिपूर्वक बोले—॥११॥ 

"हे राम! आइये, आपका कल्याण हो। आज बड़े भाग्यसे आपका समागम हुआ है। आजका दिन सफल है, आज मुझे मेरे प्रिय अतिथि प्राप्त हुए हैं"॥१२॥

मुनीश्वरको आते देख श्रीरामचन्द्रजी अत्यन्त आनन्दित होकर लक्ष्मण और सीताके सहित पृथिवीपर दण्डके समान लेट गये॥१३॥ 

तब मुनिराजने तुरंत ही रामको उठाकर भक्तिपूर्वक हृदयसे लगा लिया और उनके शरीर-स्पर्शसे प्राप्त हुए आनन्दसे उनके नेत्रोंमें जल भर आया॥१४॥

तदनन्तर मुनिश्रेष्ठ अगस्त्यजी एक हाथसे श्रीरघुनाथजीका हाथ पकड़कर उन्हें प्रसन्न मनसे अपने आश्रममें ले आये॥१५॥ 

और उन्हें सुखपूर्वक आसनपर बैठाकर उनकी विधि-विधानसे बड़ी पूजा की तथा समयानुकूल नाना प्रकारके वन्य फल भोजन कराये॥१६॥

इस प्रकार एकान्तमें सुखपूर्वक बैठे हुए चन्द्रवदन श्रीरामचन्द्रजीसे भगवान् अगस्त्य मुनिने हाथ जोड़कर कहा—॥१७॥ 

हे राम! पूर्वकालमें जिस समय क्षीरसमुद्रके समीप ब्रह्माजीने आपसे भूमिका भार उतारनेके लिये रावणका वध करनेकी प्रार्थना की थी, तभीसे आपके दर्शनोंकी इच्छासे मैं तपस्या करता हुआ और आपहीका चिन्तन करता हुआ आपके आनेकी प्रतीक्षामें यहाँ मुनियोंके साथ रहता हूँ॥१८-१९॥ 

सृष्टिके आरम्भमें विकल्प और उपाधिसे रहित आप अकेले ही थे (उस समय और कुछ भी नहीं था)। आपहीमें आश्रित तथा आपहीको विषय करनेवाली माया आपकी ही शक्ति कही जाती है॥२०॥ 

जिस समय यह माया-शक्ति आप निर्गुण को ढँक लेती है उस समय वेदान्तनिष्ठ पुरुष इसे 'अव्याकृत' कहते हैं॥२१॥ 

कोई इसे 'मूलप्रकृति' कहते हैं और कोई माया; तथा यही अविद्या, संसृति और बन्धन आदि अनेक नामोंसे पुकारी जाती है॥२२॥ 

आपके द्वारा क्षुभित होनेपर इस शक्तिसे महत्तत्त्व उत्पन्न होता है और महत्तत्त्वसे आपहीकी प्रेरणासे अहंकार प्रकट हुआ है॥२३॥ 

महत्तत्त्वसे ओत-प्रोत वह अहंकार तीन प्रकारका हुआ; जो सात्त्विक, राजस और तामस कहलाता है॥२४॥ 

हे राम! तामस अहंकारसे शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्ध—ये पाँच सूक्ष्म तन्मात्राएँ हुईं और इन सूक्ष्म तन्मात्राओंसे इनके गुणानुसार क्रमशः आकाश, वायु, अग्नि, जल और पृथिवी—ये पाँच स्थूल भूत हुए॥२५॥

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