अध्यात्मरामायण, अरण्यकाण्ड, चतुर्थ सर्ग (भाग-१)

 *अध्यात्मरामायण* 


*अरण्यकाण्ड* 


*चतुर्थ सर्ग (भाग-१)* 


*पंचवटीमें निवास और लक्ष्मणजीको उपदेश*


*श्लोक संख्या १ से ३० तक*


*श्रीमहादेवजी बोले—* 

हे पार्वति! मार्गमें जाते हुए श्रीरामचन्द्रजीने पर्वत-शिखरके समान बैठे हुए वृद्ध जटायुको देखा। उसे देखकर उनको बड़ा आश्चर्य हुआ कि 'यह क्या है?'॥१॥ 

तब वे लक्ष्मणजीसे बोले—"सौमित्रे! मेरा धनुष लाओ। देखो, सामने यह राक्षस बैठा है; मैं ऋषियोंको भक्षण करनेवाले इस दुष्टको अभी मार डालता हूँ"॥२॥

रामका यह वचन सुन गृध्रराजने भयसे व्यथित होकर कहा—"राम! मैं तुम्हारे द्वारा मारे जाने योग्य नहीं हूँ। मैं तुम्हारे पिताका प्रिय सखा जटायु नामक गृध्र हूँ। तुम्हारा कल्याण हो, मैं तो तुम्हारा हितकारी हूँ॥३-४॥ 

तुम्हारी ही हित-कामनासे मैं पंचवटीमें रहूँगा। किसी समय जब लक्ष्मणजी भी मृगयाके लिये वनमें चले जायँगे तो मैं जनकनन्दिनी सीताजीकी प्रयत्नपूर्वक रक्षा करूँगा।" गृध्रराजके ये वचन सुनकर श्रीरामचन्द्रजीने स्नेहपूर्वक कहा—॥५-६॥ 

"हे गृध्रमहाराज! ठीक है, इस पासके वनमें ही रहते हुए आप समीपवर्ती होकर अवश्य हमारा प्रियसाधन करें"॥७॥

इस प्रकार अपनी सम्मति दे भगवान् राम जटायुको आलिंगन कर भाई लक्ष्मण और सीताजीके सहित पंचवटी को गये॥८॥ 

गौतमीके तटपर पहुँचकर उन्होंने बुद्धिमान् लक्ष्मणजीसे पंचवटीमें एक विशाल कुटी बनवायी॥९॥ 

वहाँ वे सब गौतमी गंगाके उत्तर तटपर कदम्ब, पनस और आम्र आदि फलवाले वृक्षोंसे युक्त एक रोग-रहित जन-शून्य एकान्त स्थानमें बस गये। श्रीरामचन्द्रजी बुद्धिमान् लक्ष्मणके सहित जनकात्मजा सीताका मनोरंजन करते हुए उस देवलोकके समान सुरम्य स्थानमें दूसरे इन्द्रके समान सुखपूर्वक रहने लगे। राम-सेवामें जिनका चित्त लगा हुआ है वे लक्ष्मणजी नित्यप्रति उन्हें कन्द-मूल-फल लाकर देते और रात्रिके समय धनुष-बाण लेकर चारों ओर (घूमकर रक्षा करते हुए) जागा करते॥१०-१३॥ 

वे तीनों ही नित्यप्रति गौतमीमें स्नान किया करते थे। उस समय सीताजी उन दोनोंके बीचमें रहकर आया-जाया करती थीं॥१४॥ 

लक्ष्मणजी प्रसन्नचित्तसे नित्यप्रति जल लाकर भक्तिपूर्वक उनकी सेवा किया करते थे। इस प्रकार वे तीनों वहाँ सुखपूर्वक रहने लगे॥१५॥

एक दिन लक्ष्मणजीने एकान्तमें बैठे हुए परमात्मा श्रीरामके पास जाकर नम्रतापूर्वक पूछा—॥१६॥ 

"भगवन्, मैं आपके मुखारविन्दसे मोक्ष का अव्यभिचारी निश्चित साधन सुनना चाहता हूँ; अतः हे कमलनयन! आप उसका संक्षेपसे वर्णन कीजिये॥१७॥

हे रघुश्रेष्ठ! आप मुझे भक्ति और वैराग्यसे सना हुआ विज्ञानयुक्त ज्ञान सुनाइये; संसारमें आपके अतिरिक्त इस विषयका उपदेश करनेवाला और कोई नहीं है"॥१८॥

*श्रीरामजी बोले—* 

वत्स! सुन, मैं तुझे गुह्यसे भी गुह्य परम रहस्य सुनाता हूँ जिसके जान लेनेपर मनुष्य तुरंत ही विकल्पजनित (संसाररूप) भ्रमसे मुक्त हो जाता है॥१९॥ 

प्रथम मैं तुमसे मायाका स्वरूप कहूँगा, तत्पश्चात् ज्ञानका साधन बताऊँगा और फिर विज्ञानके सहित ज्ञानका वर्णन करूँगा॥२०॥ 

इनके अतिरिक्त ज्ञेय परमात्माका भी स्वरूप बतलाऊँगा जिसके जान लेनेपर मनुष्य संसार-भयसे मुक्त हो जाता है। शरीरादि अनात्मपदार्थोंमें जो आत्मबुद्धि होती है उसीको माया कहते हैं। उसीके द्वारा इस संसारकी कल्पना हुई है। हे कुलनन्दन! मायाके पहले-पहल दो रूप माने गये हैं॥२१-२२॥ 

एक विक्षेप, दूसरा आवरण। इनमेंसे पहली विक्षेप-शक्ति ही महत्तत्त्वसे लेकर ब्रह्मातक समस्त संसारकी स्थूल और सूक्ष्म भेदसे कल्पना करती है॥२३॥ 

और दूसरी आवरण-शक्ति सम्पूर्ण ज्ञानको आवरण करके स्थित रहती है। यह सम्पूर्ण विश्व रज्जुमें सर्प-भ्रमके समान शुद्ध परमात्मामें मायासे कल्पित है; विचार करनेपर यह कुछ भी नहीं ठहरता। मनुष्य जो कुछ सर्वदा सुनते, देखते और स्मरण करते हैं; वह सब स्वप्न और मनोरथोंके समान असत्य हैं। शरीर ही इस संसाररूप वृक्षकी दृढ़ मूल है॥२४‌–२६॥ 

उसीके कारण पुत्र-कलत्रादिका बन्धन है, नहीं तो आत्माका इनसे क्या सम्बन्ध है?॥२७॥ 

पाँच स्थूल भूत, पंच तन्मात्राएँ, अहंकार, बुद्धि, दस इन्द्रियाँ, चिदाभास, मन और मूलप्रकृति इन सबके समूहको क्षेत्र समझना चाहिये; इसीको शरीर भी कहते हैं॥२८-२९॥ 

निर्दोष परमात्मारूप जीव इन सबसे पृथक् है। अब मैं उस जीवको जाननेके कुछ साधन भी बताता हूँ (सावधान होकर) सुनो॥३०॥

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