अध्यात्मरामायण, अरण्यकाण्ड, नवम सर्ग (भाग-२)
*अध्यात्मरामायण*
*अरण्यकाण्ड*
*नवम सर्ग (भाग-२)*
*कबन्धोद्धार*
*श्लोक संख्या ३० से ५६ समाप्ति तक*
*गन्धर्व बोला—*
हे राम! आप अनन्त, आदि-अन्तसे रहित और मन-वाणीके अविषय हैं; (तथापि) आज मेरा मन आपकी स्तुति करनेको बड़े वेगसे उत्सुक हो रहा है॥३०॥
हे प्रभो! आपके स्थूल और सूक्ष्म दोनों शरीर (विराट् और हिरण्यगर्भ)-से आपका वास्तविक ज्ञानमय स्वरूप सूक्ष्म अर्थात् योगियोंसे भी सर्वथा दुर्ज्ञेय है। उससे अतिरिक्त जो कुछ है वह जड दृश्य और अनात्मा है। अतः आपसे भिन्न यह जड मन आपको कैसे जान सकता है? बुद्धि और चिदाभासका अन्योन्याध्यासरूप एक्यही जीव कहलाता है। इन बुद्धि आदि सबका साक्षी ब्रह्म ही है; वह मन-वाणी आदि किसीका भी विषय नहीं है, उसी निर्विकार सर्वात्मामें अज्ञानवश इस सम्पूर्ण चराचर जगत्को आरोपित किया जाता है। हे राम! आपका सूक्ष्म देह हिरण्यगर्भ और स्थूल देह विराट् कहलाता है। आपका भावनामय (हृदयकमलमें ध्यान करने योग्य) सूक्ष्म रूप जिसमें भूत, भविष्यत् और वर्तमान यह सम्पूर्ण जगत् दीख पड़ता है, अपने ध्यान करनेवालोंका मंगल करनेवाला है॥३१-३४॥
अपने-अपने उत्तरवर्ती तत्वोंसे प्रत्येक दसगुना अधिक महत्तत्त्वादि सात आवरणोंसे घिरे हुए आपके स्थूल ब्रह्माण्डशरीरमें ही धारणाका आश्रयरूप विराट् शरीर स्थित है॥३५॥
आप ही एकमात्र सर्व मोक्षस्वरूप हैं। सम्पूर्ण लोक आपहीके अवयव हैं। पाताल आपका चरणतल (तलुआ) है, महातल एड़ी है॥३६॥
हे राम! रसातल गुल्फ (टखने) हैं, तलातल जानु हैं तथा सुतल आपकी जंघाएँ और वितल आपके दो ऊरु हैं॥३७॥
अतल और पृथिवी आपकी जघन भाग (कटिदेश) हैं, भूर्लोक नाभि है, स्वर्लोक वक्षःस्थल है तथा महर्लोक आपकी ग्रीवा है॥३८॥
हे रघुश्रेष्ठ! जनलोक आपका मुख है, तपःलोक ललाट है तथा हे प्रभो! सत्यलोक आपका मस्तक है॥३९॥
हे राम! इन्द्रादि लोकपालगण आपकी भुजाएँ हैं, दिशाएँ कर्ण हैं, अश्विनीकुमार नासिका हैं और अग्नि आपका मुख बताया गया है॥४०॥
हे राम! सूर्य आपके नेत्र हैं, चन्द्रमा मन है, काल भ्रूभंगी है और बृहस्पतिजी आपकी बुद्धि हैं॥४१॥
हे निर्विकार! रुद्र आपका अहंकार है, वेद आपकी वाणी है, यम आपकी दाढ़ें हैं और नक्षत्रगण आपकी दन्तावलि है॥४२॥
सबको मोहित करनेवाली माया आपका हास्य है, सृष्टि आपका कटाक्ष है, धर्म आपका आगेका भाग है और अधर्म पीछेका भाग है॥४३॥
हे रघूत्तम! रात और दिन आपके निमेषोन्मेष हैं। हे प्रभो! सातों समुद्र आपकी कुक्षि और नदियाँ नाङियाँ हैं॥४४॥
हे प्रभो! वृक्ष और औषधियाँ आपके रोम, वृष्टि आपका वीर्य और ज्ञानशक्ति आपकी महिमा है। यही आपका स्थूल शरीर है॥४५॥
यदि पुरुष आपके इस स्थूल शरीरमें मन स्थिर करे (धारणा करे) तो वह अनायास ही मुक्त हो जाता है। हे राम! आपके इस स्थूल रूपसे पृथक् और कोई पदार्थ नहीं है॥४६॥
अतः हे राम! मैं आपके उस स्थूल रूपका ही सदा चिन्तन करता हूँ, जिसके ध्यानमात्रसे ही शरीरमें रोमांचके सहित (हृदयमें) प्रेम-रसका संचार हो जाता है॥४७॥
हे राम! जब यह जीव आपके विराट् रूपका चिन्तन करता है तो तत्काल ही उसकी मुक्ति हो जाती है तो भी मुझे उसकी आवश्यकता नहीं। मैं तो आपके इस (रामरूप)-का ही चिन्तन करूँगा॥४८॥
हे रघुनन्दन! (मेरी यही प्रार्थना है कि) लक्ष्मणजीके सहित सीताको खोजता हुआ आपका यह जटा-वल्कल-विभूषित धनुष-बाणधारी तरुणवयस्क श्यामरूप सदा मेरे मनमें विराजमान रहे। हे रघुश्रेष्ठ! आपके इस दिव्य रूपका पार्वतीजीके सहित सर्वज्ञ श्रीशंकरभगवान् सर्वदा चिन्तन किया करते हैं और काशीमें मरनेवालोंको ब्रह्मवाचक 'राम-राम' इस तारकमन्त्रका उपदेश करते हुए सदा अति आनन्दमें मग्नचित्त रहते हैं। अतः हे जानकीनाथ! आप निश्चय ही परमात्मा हैं॥४९-५२॥
आपकी मायासे मोहित होनेके कारण सब लोग आपका वास्तविक स्वरूप नहीं जानते। हे संसारकी रचना करनेवाले परमात्मा राम! मैं आपको नमस्कार करता हूँ॥५३॥
हे सौमित्रिसेवित अयोध्यानाथ! आपको नमस्कार है। हे जगन्नाथ! आप मेरी रक्षा कीजिये, आपकी माया मुझे मोहित न करे॥५४॥
*श्रीरामचन्द्रजी बोले—*
हे देवगन्धर्व! मैं तुम्हारी भक्ति और स्तुतिसे अति सन्तुष्ट हूँ। हे अनघ! तुम योगियोंके प्राप्त करनेयोग्य मेरे सनातन परमधामको जाओ॥५५॥
जो लोग तुम्हारे इस आगमोक्त स्तोत्रका अनन्य बुद्धिसे नित्य भक्तिपूर्वक जप करेंगे, वे अन्तमें अज्ञानजन्य संसारसे मुक्त होकर जगद्रूप कार्यके द्वारा अनुमान करनेयोग्य ज्ञानस्वरूप नित्य मुझ परमात्माको प्राप्त करेंगे॥५६॥
*इति श्रीमदध्यात्मरामायणे उमामहेश्वरसंवादे अरण्यकाण्डे नवमः सर्गः॥९॥*
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