अध्यात्मरामायण, अरण्यकाण्ड, अष्टम सर्ग (भाग-१)

*अध्यात्मरामायण* 


*अरण्यकाण्ड* 


*अष्टम सर्ग (भाग-१)* 


*सीताजीके वियोगमें भगवान् रामका विलाप और जटायुसे भेंट*


*श्लोक संख्या १ से २९ तक*


*श्रीमहादेवजी बोले—*

(हे पार्वति!) इधर रामचन्द्रजी जब कामरूपधारी मायावी राक्षसको मारकर अपने आश्रमपर चलनेके लिये प्रस्थान किये तो उन्होंने दूरसे ही दीन और उदास मुखसे लक्ष्मणको आते देखा। तब महामति रघुनाथजी मन-ही-मन सोचने लगे॥१-२॥ 

'लक्ष्मणको यह पता नहीं है कि मैंने मायामयी सीता बना दी है। मैं यह जानता हूँ तथापि लक्ष्मणसे यह बात छिपाकर मैं साधारण मनुष्यके समान शोक करूँगा॥३॥ 

यदि मैं उपराम होकर चुपचाप अपनी कुटीमें बैठ गया तो इन करोड़ों राक्षसोंके नाशका उपाय कैसे होगा?॥४॥ 

यदि मैं उसके लिये दुःखातुर होकर कामी पुरुषके समान शोक करूँगा तो क्रमशः सीताकी खोज करता हुआ राक्षसराज रावणके यहाँ पहुँच जाऊँगा और उसे कुलसहित मारकर अपने-आप ही अग्निमें स्थापित की हुई सीताको उसमेंसे निकालकर फिर तुरंत अयोध्या चला जाऊँगा। ब्रह्माकी प्रार्थनासे मैंने मनुष्यावतार लिया है, अतः मैं कुछ समय पृथ्वीपर मनुष्यभावसे ही रहूँगा। इससे मुझ माया-मानवके चरित्रोंको सुननेवाले भक्त-परायण पुरुषोंकी अनायास ही मुक्ति हो जायगी'॥५-७½॥ 

श्रीरामचन्द्रजीने इस प्रकार निश्चयकर लक्ष्मणजीकी ओर देखकर कहा—॥८॥ 

"लक्ष्मण! तुम मेरी प्रिया सीताको छोड़कर कैसे चले आये? अब राक्षसगण जनकनन्दिनी सीताको हर ले गये होंगे अथवा उन्हें खा गये होंगे"॥९॥

तब लक्ष्मणजीने हाथ जोड़कर रोते हुए सीताजीके दुर्वाक्य कह सुनाये। (वे बोले—) "आपके वाक्यके समान राक्षसके कहे हुए 'हा लक्ष्मण!' इस शब्दको सुनकर सीताजीने शीघ्रतासे मुझसे कहा—'फौरन जाओ'। तब मैंने रोती हुई उन्हें समझाया कि देवि! यह रघुनाथजीका वाक्य नहीं है, राक्षसका शब्द है, हे शुचिस्मिते! तुम निश्चिन्त रहो॥१०-११॥ 

मेरे इस प्रकार ढाढ़स बँधानेपर भी साध्वी सीताजीने मुझसे जैसे दुर्वचन कहे हैं, हे रघुनाथजी! वे आपके सामने कहने योग्य नहीं हैं। अतः मैं कान मूँदकर वहाँसे आपको देखनेके लिये चला आया"॥१२½॥

इस पर श्रीरामचन्द्रजीने कहा—"लक्ष्मण! ठीक है, तथापि तुमने उचित नहीं किया॥१३॥ 

जो स्त्रीकी बातको सत्य मानकर शुभानना सीताको छोड़ दिया। इसमें सन्देह नहीं अब राक्षसलोग या तो उन्हें हर ले गये होंगे या खा गये होंगे"॥१४॥

इस प्रकार चिन्ता करते हुए श्रीरामचन्द्रजी बड़ी शीघ्रतासे अपने आश्रममें आये और वहाँ जानकीजीको न देखकर अति दुःखित होकर विलाप करने लगे—॥१५॥ 

'हा प्रिये! आज तुम पूर्ववत् आश्रममें दिखायी नहीं देती हो, सो कहाँ चली गयी हो? अथवा मुझे मोहित करनेके लिये विनोदसे ही कहीं छिप रही हो?॥१६॥

इस प्रकार विलाप करते हुए उन्होंने सारा वन छान डाला, किन्तु कहीं भी जानकीजीको नहीं देखा। तब (वे कहने लगे—) "अयि वनदेवियो! बताओ, मेरी वल्लभा सीता कहाँ है? अरे मृग, पक्षी और वृक्षो! तुम्हीं मेरी प्रियाको दिखाओ"॥१७½॥ 

इस प्रकार विलाप करते हुए सर्वज्ञ श्रीरघुनाथजीने सीताजीको कहीं भी नहीं देखा॥१८॥ 

(अहो!) भगवान् रामने आनन्दस्वरूप होकर भी सीताजीके लिये शोक किया, निश्चल होनेपर भी उनकी खोजमें इधर-उधर दौड़ते फिरे तथा ममता और अहंकारसे शून्य अखण्डानन्दस्वरूप होकर भी अत्यन्त दुःखित हो मेरी 'जाया' तथा 'सीता!' ऐसा कहकर विलाप किया॥१९-२०॥ 

इस प्रकार मायाका अनुसरण करते हुए श्रीरघुनाथजी अनासक्त होते हुए भी मूढ़ पुरुषोंको आसक्त-से प्रतीत होते हैं, किन्तु तत्त्वज्ञानियोंको ऐसा भ्रम नहीं होता॥२१॥

इस प्रकार लक्ष्मणके सहित श्रीरामचन्द्रजीने सम्पूर्ण वनमें सीताजीको ढूँढ़ते-ढूँढ़ते पृथिवीपर टूटे रथ-छत्र, धनुष और कूबर (रथकी एक लकड़ी) पड़े देखे। उन्हें देखकर भगवान् रामने लक्ष्मणजीसे कहा— "लक्ष्मण! देखो यहाँ सीताजीको ले जाते हुए किसी पुरुषको कोई अन्य व्यक्ति (युद्ध में) जीतकर उन्हें हर ले गया है"॥२२-२३॥ 

फिर कुछ दूर जानेपर एक पर्वत-सदृश शरीरको रुधिरसे लथपथ देखकर रामने कहा—॥२४॥ 

"देखो, निस्सन्देह यही उस शुभदर्शना सीताको खाकर अत्यन्त तृप्त हो यहाँ एकान्तमें सो रहा है। मैं इस निशाचरको अभी मार डालता हूँ। हे रघुनन्दन लक्ष्मण! शीघ्र ही मेरा धनुष-बाण लाओ"॥२५½॥

रामका यह कथन सुन जटायुने भयभीत होकर कहा—॥२६॥ 

"मैं अपने ही कर्मसे मर रहा हूँ; आपका कल्याण हो, आप मुझे न मारें। मैं जटायु हूँ। मैंने आपकी भार्याको ले जानेवाले रावणका पीछा किया था। हे शत्रुदमन! मेरा उससे युद्ध हुआ और मैंने उसके रथ, घोड़े और धनुष भी काट डाले, किन्तु अब मैं उसका घायल किया हुआ पड़ा हूँ। हे जगन्नाथ! आप मेरी ओर देखिये, मैं अब प्राण छोड़ना ही चाहता हूँ॥२७-२९॥

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