अध्यात्मरामायण, अरण्यकाण्ड, प्रथम सर्ग
*ॐ* *अध्यात्मरामायण* *अरण्यकाण्ड* *प्रथम सर्ग* *विराध-वध* *श्रीमहादेवजी बोले—* हे पार्वति! उस दिन अत्रि मुनिके आश्रममें ही रहकर दूसरे दिन प्रात:काल स्नान करनेके अनन्तर श्रीरघुनाथजीने मुनिवरकी सम्मतिसे चलनेकी तैयारी की॥१॥ वे बोले—"हे मुने! हम सब मुनिमण्डलीसे सुशोभित दण्डकारण्यको जाना चाहते हैं, अत: आप हमें आज्ञा प्रदान कीजिये॥२॥ और हमें मार्ग दिखानेके लिये कुछ शिष्योंको आज्ञा दीजिये।" रामजीका यह कथन सुनकर महायशस्वी अत्रि मुनि श्रीरघुनाथजीसे हँसकर बोले—"हे राम! हे देवताओंके आश्रयस्वरूप! सबके मार्गदर्शक तो आप हैं, फिर आपका मार्गदर्शक कौन बनेगा? तथापि इस समय आप लोक-व्यवहारका अनुसरण कर रहे हैं। अत: मेरे शिष्यगण आपको मार्ग दिखानेके लिये जायँगे"॥३-४॥ तदनन्तर शिष्योंको आज्ञा दे मुनिवर अत्रि स्वयं भी कुछ दूर रामचन्द्रजीके साथ गये और फिर उनके प्रीतिपूर्वक मना करनेपर अपने आश्रमको लौट आये॥५॥ एक कोश जानेपर श्रीरामचन्द्रजीने एक बहुत बड़ी नदी देखी। तब कमलनयन रघुनाथजीने अत्रिके शिष्योंसे इस प्रकार पूछा—॥६॥ "हे ब्रह्मचारियों! नदीको पार करनेका कोई उपाय है या नही...