Posts

Showing posts from August, 2024

अध्यात्मरामायण, अरण्यकाण्ड, प्रथम सर्ग

  *ॐ* *अध्यात्मरामायण*  *अरण्यकाण्ड* *प्रथम सर्ग* *विराध-वध* *श्रीमहादेवजी बोले—*  हे पार्वति! उस दिन अत्रि मुनिके आश्रममें ही रहकर दूसरे दिन प्रात:काल स्नान करनेके अनन्तर श्रीरघुनाथजीने मुनिवरकी सम्मतिसे चलनेकी तैयारी की॥१॥  वे बोले—"हे मुने! हम सब मुनिमण्डलीसे सुशोभित दण्डकारण्यको जाना चाहते हैं, अत: आप हमें आज्ञा प्रदान कीजिये॥२॥  और हमें मार्ग दिखानेके लिये कुछ शिष्योंको आज्ञा दीजिये।" रामजीका यह कथन सुनकर महायशस्वी अत्रि मुनि श्रीरघुनाथजीसे हँसकर बोले—"हे राम! हे देवताओंके आश्रयस्वरूप! सबके मार्गदर्शक तो आप हैं, फिर आपका मार्गदर्शक कौन बनेगा? तथापि इस समय आप लोक-व्यवहारका अनुसरण कर रहे हैं। अत: मेरे शिष्यगण आपको मार्ग दिखानेके लिये जायँगे"॥३-४॥  तदनन्तर शिष्योंको आज्ञा दे मुनिवर अत्रि स्वयं भी कुछ दूर रामचन्द्रजीके साथ गये और फिर उनके प्रीतिपूर्वक मना करनेपर अपने आश्रमको लौट आये॥५॥ एक कोश जानेपर श्रीरामचन्द्रजीने एक बहुत बड़ी नदी देखी। तब कमलनयन रघुनाथजीने अत्रिके शिष्योंसे इस प्रकार पूछा—॥६॥  "हे ब्रह्मचारियों! नदीको पार करनेका कोई उपाय है या नही...

अध्यात्मरामायण, अरण्यकाण्ड, द्वितीय सर्ग

  *अध्यात्मरामायण*  *अरण्यकाण्ड* *द्वितीय सर्ग* *शरभंग तथा सुतीक्ष्ण आदि मुनीश्वरोंसे भेंट* *श्रीमहादेवजी बोले—* हे पार्वति! विराधके स्वर्ग सिधारनेपर श्रीरामचन्द्रजी लक्ष्मण और सीताजीके साथ शरभंग मुनिके सर्वसुखदायक तपोवनको गये॥१॥  मतिमान् शरभंग श्रीरामचन्द्रजीको सीता और लक्ष्मणके सहित आते देख सहसा उठ खड़े हुए॥२॥  और आगे बढ़कर उनकी भली प्रकार पूजा कर उनको आसनपर बैठाया तथा कन्द-मूल-फलादिसे उनका आतिथ्य-सत्कार किया॥३॥  तदनन्तर मुनिवर शरभंगने भक्तवत्सल भगवान् रामसे प्रीतिपूर्वक कहा—"मैं बहुत कालसे आपके दर्शनोंकी आकांक्षासे तपस्याका निश्चय कर यहीं रहता हूँ। हे राम! आप साक्षात् परमेश्वर हैं। मुझे तपस्याके द्वारा बहुत-सा पुण्य प्राप्त हुआ है वह सब आज आपको समर्पितकर मैं मोक्षपदको प्राप्त करूँगा"॥४-५॥  ऐसा कह महाविरक्त योगिवर शरभंग अपना महान् पुण्य-फल श्रीरामचन्द्रजीको समर्पणकर सीताके सहित अप्रमेय (भगवान्) रामको प्रणामकर सहसा चितापर चढ़ गये॥६॥ उस समय वे (मन-ही-मन) सर्वान्तर्यामी दूर्वादलके समान श्यामवर्ण, कमलनयन, चीराम्बरधारी, स्निग्धजटाजूटधारी श्रीरामचन्द्रजीका सीता...

अध्यात्मरामायण, अरण्यकाण्ड, तृतीय सर्ग (भाग-१)

*अध्यात्मरामायण*  *अरण्यकाण्ड*  *तृतीय सर्ग (भाग-१)*  *मुनिवर अगस्त्यजीसे भेंट* *श्लोक संख्या १ से २५ तक* *श्रीमहादेवजी बोले—*  (हे पार्वति!) (उस दिन) मध्याह्नके समय श्रीरामचन्द्रजी सुतीक्ष्ण, सीता और लक्ष्मणके साथ अगस्त्य मुनिके छोटे भाई (अग्निजिह्व मुनि)-के आश्रममें पहुँचे॥१॥  उन्होंने उनकी भली प्रकार पूजा की (फिर उनके दिये हुए) कन्द-मूल-फल आदि खाकर, दूसरे दिन प्रातःकाल उठते ही अगस्त्य मुनिके आश्रमको चले॥२॥ वह आश्रम समस्त ऋतुओंके फल और पुष्पोंसे परिपूर्ण, विविध वन्य पशुओंसे सेवित तथा नाना प्रकारके पक्षियोंसे गुंजायमान नन्दन वनके समान (सुशोभित) था॥३॥  वह ब्रह्मर्षियों और देवर्षियोंसे सेवित था तथा उसके चारों ओर उन ऋषियोंके आश्रम सुशोभित थे। इस प्रकार वह साक्षात् दूसरे ब्रह्मलोकके समान जान पड़ता था॥४॥ आश्रमके बाहर रहकर श्रीरामचन्द्रजीने सुतीक्ष्ण मुनिसे कहा—"हे सुतीक्ष्ण! तुम शीघ्र ही मुनिवर अगस्त्यजीके पास जाकर उन्हें सीता और लक्ष्मणके सहित मेरे आनेकी सूचना दो।" तब सुतीक्ष्ण 'बड़ी प्रसन्नताकी बात है' ऐसा कह शीघ्रतासे गुरुजीके आश्रममें गये। वहाँ जाकर सुतीक्ष...

अध्यात्मरामायण, अरण्यकाण्ड, तृतीय सर्ग (भाग-२)

*अध्यात्मरामायण*  *अरण्यकाण्ड*  *तृतीय सर्ग (भाग-२)*  *मुनिवर अगस्त्यजीसे भेंट* *श्लोक संख्या २६ से ५० समाप्ति तक* राजस अहंकारसे दस इन्द्रियाँ और सात्त्विक अहंकारसे इन्द्रियोंके अधिष्ठाता देवता तथा मन उत्पन्न हुए और इन सबसे मिलकर समष्टि-सूक्ष्म-शरीररूप हिरण्यगर्भ हुआ, जिसका दूसरा नाम सूत्रात्मा भी है॥२६॥  फिर स्थूल भूतसमूहसे विराट् उत्पन्न हुआ तथा विराट् पुरुषसे यह सम्पूर्ण स्थावर-जंगम संसार प्रकट हुआ॥२७॥ (हे जगदीश्वर!) काल और कर्मके क्रमसे आप ही देव, तिर्यक् और मनुष्य आदि योनियोंमें प्रकट हुए हैं। अपने मायिक गुणोंके भेदसे आप ही रजोगुणद्वारा जगत्कर्ता ब्रह्माजी, सत्त्वगुणद्वारा जगत्‌की रक्षा करनेवाले विष्णु और तमोगुणसे उसका लय करनेवाले भगवान् रुद्र हुए हैं; ऐसा विद्वान् पुरुष कहते हैं॥२८-२९॥ हे राम! बुद्धिके सत्त्व, रज और तम—इन तीन गुणोंसे ही प्राणीकी क्रमश: जाग्रत्, स्वप्न और सुषुप्ति—यह तीन अवस्थाएँ होती है, पर आप इन तीनोंसे सर्वथा पृथक्, इनके साक्षी, चित्स्वरूप और अविकारी है॥३०॥  हे रघुनन्दन! जिस समय आप सृष्टिरूपी लीलाका विस्तार करना चाहते हैं उस समय मायाको अ...

अध्यात्मरामायण, अरण्यकाण्ड, चतुर्थ सर्ग (भाग-१)

 *अध्यात्मरामायण*  *अरण्यकाण्ड*  *चतुर्थ सर्ग (भाग-१)*  *पंचवटीमें निवास और लक्ष्मणजीको उपदेश* *श्लोक संख्या १ से ३० तक* *श्रीमहादेवजी बोले—*  हे पार्वति! मार्गमें जाते हुए श्रीरामचन्द्रजीने पर्वत-शिखरके समान बैठे हुए वृद्ध जटायुको देखा। उसे देखकर उनको बड़ा आश्चर्य हुआ कि 'यह क्या है?'॥१॥  तब वे लक्ष्मणजीसे बोले—"सौमित्रे! मेरा धनुष लाओ। देखो, सामने यह राक्षस बैठा है; मैं ऋषियोंको भक्षण करनेवाले इस दुष्टको अभी मार डालता हूँ"॥२॥ रामका यह वचन सुन गृध्रराजने भयसे व्यथित होकर कहा—"राम! मैं तुम्हारे द्वारा मारे जाने योग्य नहीं हूँ। मैं तुम्हारे पिताका प्रिय सखा जटायु नामक गृध्र हूँ। तुम्हारा कल्याण हो, मैं तो तुम्हारा हितकारी हूँ॥३-४॥  तुम्हारी ही हित-कामनासे मैं पंचवटीमें रहूँगा। किसी समय जब लक्ष्मणजी भी मृगयाके लिये वनमें चले जायँगे तो मैं जनकनन्दिनी सीताजीकी प्रयत्नपूर्वक रक्षा करूँगा।" गृध्रराजके ये वचन सुनकर श्रीरामचन्द्रजीने स्नेहपूर्वक कहा—॥५-६॥  "हे गृध्रमहाराज! ठीक है, इस पासके वनमें ही रहते हुए आप समीपवर्ती होकर अवश्य हमारा प्रियसाधन करें"॥७॥...

अध्यात्मरामायण, अरण्यकाण्ड, चतुर्थ सर्ग (भाग-२)

 *अध्यात्मरामायण*  *अरण्यकाण्ड*  *चतुर्थ सर्ग (भाग-२)*  *पंचवटीमें निवास और लक्ष्मणजीको उपदेश* *श्लोक संख्या ३१ से ५५ समाप्ति तक* जीव और परमात्मा यह पर्याय शब्द हैं—दोनोंका अभिप्राय एक ही है; अतः इसमें भेद-बुद्धि नहीं (करनी चाहिए)। अभिमानसे दूर रहना, दम्भ और हिंसा आदिका त्याग करना॥३१॥  दूसरों के किये हुए आक्षेपादिको सहन करना, सर्वत्र सरल भाव रखना, मन, वचन और शरीरके द्वारा सच्ची भक्तिसे सद्गुरुकी सेवा करना॥३२॥  बाह्य और आन्तरिक शुद्धि रखना, सत्कर्मोंमें तत्पर रहना, मन, वाणी और शरीरका संयम करना, विषयोंमें प्रवृत्त न होना॥३३॥  अहंकारशून्य रहना, जन्म, मृत्यु, रोग और बुढ़ापे आदिके कष्टोंका विचार करना, पुत्र स्त्री और धन आदिमें आसक्ति तथा स्नेह न करना॥३४॥  इष्ट और अनिष्टकी प्राप्तिमें चित्तको सदा समान रखना, मुझ सर्वात्मा राममें अनन्य बुद्धि रखना॥३५॥  जनसमूहसे शून्य पवित्र देशमें रहना, संसारी लोगोंसे सर्वदा उदासीन रहना॥३६॥  आत्मज्ञानका सदा उद्योग करना तथा वेदान्तके अर्थका विचार करना—इन उक्त साधनोंसे तो ज्ञान प्राप्त होता है और इनके विपरीत आचरण ...

अध्यात्मरामायण, अरण्यकाण्ड, पञ्चम सर्ग (भाग-१)

*अध्यात्मरामायण*  *अरण्यकाण्ड*  *पञ्चम सर्ग (भाग-१)*  *शूर्पणखाको दण्ड, खर आदि राक्षसोंका वध और शूर्पणखाका रावणके पास जाना* *श्लोक संख्या १ से ३१ तक* *श्रीमहादेवजी बोले—* (हे पार्वति!) उस समय उस घोर वनमें जनस्थानकी रहनेवाली एक महाबलवती इच्छानुसार रूप धारण करनेवाली राक्षसी घूमा करती थी॥१॥  एक दिन पंचवटीके पास गौतमी नदीके तीरपर जगत्पति श्रीरामचन्द्रजीके पद्म, वज्र और अंकुशकी रेखाओंसे युक्त चरण-चिह्नोंको देखकर वह उनके सौन्दर्यसे मोहित होकर कामासक्त हुई उन्हें देखती-देखती धीरे-धीरे रघुनाथजीके आश्रममें चली आयी॥२-३॥  वहाँ आकर कामदेवके समान अति सुन्दर लक्ष्मीपति श्रीरामचन्द्रजीको सीताजीके साथ बैठे देखकर वह कामातुरा राक्षसी रघुनाथजीसे बोली—"तुम किसके (पुत्र) हो? तुम्हारा क्या नाम है? इस आश्रममें जटा-वल्कलादि धारण कर क्यों रहते हो? यहाँ रहकर तुम क्या प्राप्त करना चाहते हो? सो मुझे बताओ॥४-५॥  मैं राक्षसराज महात्मा रावणकी बहिन कामरूपिणी राक्षसी शूर्पणखा हूँ॥६॥  मैं अपने भाई खरके साथ इसी वनमें रहती हूँ। राजाने मुझे इस सम्पूर्ण वनका अधिकार सौंप दिया है, (अतः) मैं म...

अध्यात्मरामायण, अरण्यकाण्ड, पञ्चम सर्ग (भाग-२)

*अध्यात्मरामायण*  *अरण्यकाण्ड*  *पञ्चम सर्ग (भाग-२)*  *शूर्पणखाको दण्ड, खर आदि राक्षसोंका वध और शूर्पणखाका रावणके पास जाना* *श्लोक संख्या ३२ से ६१ समाप्ति तक* तब श्रीरामचन्द्रजीने अपनी कमर कसी और कठोर धनुष तथा दो अक्षयबाणवाले तरकश बाँधकर युद्धके लिये तैयार हो गये॥३२॥  तदनन्तर राक्षसगण वहाँ आकर रामके ऊपर नाना प्रकारके अस्त्र-शस्त्र, पत्थर और वृक्षादिकी वर्षा करने लगे॥३३॥  श्रीरामचन्द्रजीने एक क्षणमात्रमें लीलासे ही उन अस्त्र-शस्त्रादिको तिल-तिल करके काट डाला। फिर सहस्रों बाणोंसे उन सम्पूर्ण राक्षसोंको मारकर खर, दूषण और त्रिशिराको भी मार डाला। इस प्रकार रघुवंशियोंमें श्रेष्ठ श्रीरामचन्द्रजीने आधे पहरमें ही उन समस्त राक्षसोंका संहार कर दिया॥३४-३५॥ तब लक्ष्मणजीने गुहामेंसे सीताजीको लाकर श्रीरघुनाथजीको सौंप दिया। उस समय सम्पूर्ण राक्षसोंको मरे हुए देख वे बड़े विस्मित हुए॥३६॥  जनकनन्दिनी श्रीसीताजीने प्रसन्नमुखसे श्रीरामचन्द्रजीका आलिंगन किया और उनके शरीरमें हुए शस्त्रके घावोंपर हाथ फेरने लगीं॥३७॥  उन सम्पूर्ण श्रेष्ठ राक्षसोंको मरे देख राक्षसराज रावणकी बहिन...

अध्यात्मरामायण, अरण्यकाण्ड, षष्ठ सर्ग

*अध्यात्मरामायण*  *अरण्यकाण्ड*  *षष्ठ सर्ग*  *रावणका मारीचके पास जाना* *श्रीमहादेवजी बोले—*  हे पार्वति! रात्रिके समय इस प्रकार विचारकर प्रातःकाल होनेपर बुद्धिमान् रावण रथमें सवार हुआ और अपने मन-ही-मन एक कार्य निश्चय कर वह समुद्रके दूसरे तटपर मारीचके घर गया। वहाँ मारीच मुनियोंके समान जटा-वल्कलादि धारणकर प्राकृत गुणोंके प्रकाशक निर्गुण भगवान्‌का ध्यान कर रहा था। समाधि भंग होनेपर उसने रावणको अपने घर आया देखा॥१-३॥  रावणको देखते ही वह शीघ्रतासे उठ खड़ा हुआ और उससे गले मिलकर उसकी विधिपूर्वक पूजा की तथा आतिथ्य-सत्कारके अनन्तर जब रावण स्वस्थ होकर बैठा तो मारीच उससे बोला—॥४॥  "हे रावण! इस समय तुम एक ही रथके साथ आये हो और तुम्हारा चित्त किसी कार्यके विचारमें चिन्ताग्रस्त-सा प्रतीत होता है॥५॥  यदि गोपनीय न हो तो मुझे वह कार्य बताओ। हे राजेन्द्र! यदि उसके करनेमें मुझे पाप न लगे और वह न्यायानुकूल हो तो कहो, मैं तुम्हारा वह प्रिय कार्य अवश्य करूँगा"॥६॥ *रावण बोला–* (कहते हैं—) राजा दशरथ अयोध्यापुरीका अधिपति है, उसका ज्येष्ठ पुत्र सत्यपराक्रमी राम है॥७॥  उस अपन...

अध्यात्मरामायण, अरण्यकाण्ड, सप्तम सर्ग (भाग-१)

*अध्यात्मरामायण*  *अरण्यकाण्ड*  *सप्तम सर्ग (भाग-१)*  *मारीचवध और सीताहरण* *श्लोक संख्या १ से ३४ तक* *श्रीमहादेवजी बोले—* (हे पार्वति!) इधर रामचन्द्रजीने भी रावणका सारा षड्यन्त्र जानकर एकान्तमें श्रीजानकीजीसे कहा—"हे सीते! मैं जो कुछ कहता हूँ वह सुनो॥१॥  हे शुभे! रावण तुम्हारे पास भिक्षुका रूप धारण करके आयेगा, अतः तुम अपने ही समान आकृतिवाली अपनी छायाको कुटीमें छोड़कर अग्निमें प्रवेश कर जाओ और मेरी आज्ञासे वहाँ अदृश्यरूपसे एक वर्ष रहो। तदनन्तर रावणके मारे जानेपर तुम मुझे पूर्ववत् पा लोगी"॥२-३॥  रामचन्द्रजीके वचन सुनकर सीताजीने भी वैसा ही किया। वे मायामयी सीताको बाहर कुटीमें छोड़कर स्वयं अग्निमें अन्तर्धान हो गयीं॥४॥ तब उस मायासीताने मायामय मृगको देखकर श्रीरामचन्द्रजीके पास आकर हँसते हुए बड़ी नम्रतासे कहा—॥५॥  "हे राम! यह रत्न-विभूषित विचित्र सुवर्ण-मृग देखिये। (अहो!) इसके शरीरमें कैसे अद्भुत बिन्दु हैं और यह कैसी निर्भयतासे विचर रहा है? हे प्रभो! आप इसे बाँधकर मुझे ला दीजिये; यह सुन्दर हरिण मेरा क्रीड़ामृग हो"॥६॥ तब रामचन्द्रजीने 'बहुत अच्छा' कह अपना धनुष उठ...

अध्यात्मरामायण, अरण्यकाण्ड, सप्तम सर्ग (भाग-२)

*अध्यात्मरामायण*  *अरण्यकाण्ड*  *सप्तम सर्ग (भाग-२)*  *मारीचवध और सीताहरण* *श्लोक संख्या ३५ से ६६ समाप्ति तक* ऐसा कहकर वे अपनी भुजाओंसे छाती पीटती हुई रोने लगीं। उनके ऐसे कठोर शब्द सुन लक्ष्मणजीने अति दुःखित हो अपने दोनों कान मूँद लिये और कहा—"हे चण्डि! तुम्हें धिक्कार है, तुम मुझे ऐसी बातें कह रही हो! इससे तुम नष्ट हो जाओगी।" ऐसा कह लक्ष्मणजी सीताको वनदेवियोंको सौंपकर दुःखसे अत्यन्त खिन्न हो धीरे-धीरे रामके पास चले॥३५-३६½॥  इसी समय मौका समझकर रावण भिक्षुका वेष बना दण्ड-कमण्डलुके सहित सीताके पास आया। सीताने उसे देखकर तुरंत ही प्रणाम किया और भक्तिपूर्वक उसका पूजन कर कन्द-मूल-फल आदि देकर स्वागत करते हुए कहा—"हे मुने! ये फल आदि खाकर सुखपूर्वक विश्राम कीजिये। अभी थोड़ी देरमें ही मेरे पतिदेव आते होंगे। यदि आपकी इच्छा हो तो कुछ देर ठहरिये। वे आपका कुछ विशेष सत्कार कर सकेंगे"॥३७-४०॥ *भिक्षु बोला—* हे कमललोचने! तुम कौन हो? तुम्हारे पति कौन हैं; हे अनघे! इस राक्षससेवित वनमें तुम क्यों रहती हो; हे कल्याणि! ये सब बातें बताओ, तब मैं भी तुम्हें अपना सारा वृत्तान्त सुनाऊँगा॥४१॥...

अध्यात्मरामायण, अरण्यकाण्ड, अष्टम सर्ग (भाग-१)

*अध्यात्मरामायण*  *अरण्यकाण्ड*  *अष्टम सर्ग (भाग-१)*  *सीताजीके वियोगमें भगवान् रामका विलाप और जटायुसे भेंट* *श्लोक संख्या १ से २९ तक* *श्रीमहादेवजी बोले—* (हे पार्वति!) इधर रामचन्द्रजी जब कामरूपधारी मायावी राक्षसको मारकर अपने आश्रमपर चलनेके लिये प्रस्थान किये तो उन्होंने दूरसे ही दीन और उदास मुखसे लक्ष्मणको आते देखा। तब महामति रघुनाथजी मन-ही-मन सोचने लगे॥१-२॥  'लक्ष्मणको यह पता नहीं है कि मैंने मायामयी सीता बना दी है। मैं यह जानता हूँ तथापि लक्ष्मणसे यह बात छिपाकर मैं साधारण मनुष्यके समान शोक करूँगा॥३॥  यदि मैं उपराम होकर चुपचाप अपनी कुटीमें बैठ गया तो इन करोड़ों राक्षसोंके नाशका उपाय कैसे होगा?॥४॥  यदि मैं उसके लिये दुःखातुर होकर कामी पुरुषके समान शोक करूँगा तो क्रमशः सीताकी खोज करता हुआ राक्षसराज रावणके यहाँ पहुँच जाऊँगा और उसे कुलसहित मारकर अपने-आप ही अग्निमें स्थापित की हुई सीताको उसमेंसे निकालकर फिर तुरंत अयोध्या चला जाऊँगा। ब्रह्माकी प्रार्थनासे मैंने मनुष्यावतार लिया है, अतः मैं कुछ समय पृथ्वीपर मनुष्यभावसे ही रहूँगा। इससे मुझ माया-मानवके चरित्रोंको...

अध्यात्मरामायण, अरण्यकाण्ड, अष्टम सर्ग (भाग-२)

*अध्यात्मरामायण*  *अरण्यकाण्ड*  *अष्टम सर्ग (भाग-२)*  *सीताजीके वियोगमें भगवान् रामका विलाप और जटायुसे भेंट* *श्लोक संख्या ३० से ५६ समाप्ति तक* यह सुनकर श्रीरघुनाथजीने (जटायुके पास जाकर) उसे कण्ठगतप्राण और अति दीन अवस्थामें देखा। तब वे आँखोंमें आँसू भरकर उसपर हाथ फेरते हुए (बोले—)॥३०॥  "हे जटायो! कहो। मेरी सुमुखी भार्या सीताजीको कौन ले गया है? (अहो!) तुम मेरे कार्यके लिये मारे गये। अतः अवश्य ही तुम मेरे प्रिय बन्धु हो"॥३१॥ जटायुने रक्त वमन करते हुए लड़खड़ाती बोलीमें कहा—"हे राम! महापराक्रमी राक्षसराज रावण मिथिलेशनन्दिनी सीताको दक्षिणकी ओर ले गया है और अधिक कहनेकी मुझमें शक्ति नहीं है। मैं अभी आपके सामने ही प्राण छोड़ना चाहता हूँ॥३२-३३॥  हे राम! आज बड़े भाग्यसे मैंने मरते समय आपको देख पाया है। ही अनघ! आप मायामानवरूप साक्षात् परमात्मा विष्णु ही हैं॥३४॥ हे रघुश्रेष्ठ! वैसे तो अन्त समय आपका दर्शन करनेसे ही मैं मुक्त हो गया, तथापि आप मुझे अपने कर (कमलों)-से स्पर्श कीजिये। फिर मैं आपके परमपदको जाऊँगा"॥३५॥ तब रामचन्द्रजीने मुसकराते हुए 'बहुत अच्छा' कह उसका शरीर अपन...

अध्यात्मरामायण, अरण्यकाण्ड, नवम सर्ग (भाग-१)

  *अध्यात्मरामायण*  *अरण्यकाण्ड*  *नवम सर्ग (भाग-१)*  *कबन्धोद्धार* *श्लोक संख्या १ से २९ तक* *श्रीमहादेवजी बोले—* (हे पार्वति!) तदनन्तर श्रीरामचन्द्रजी दुःखी होकर फिर सीताजीको खोजते हुए लक्ष्मणजीके साथ दूसरे वनको गये॥१॥  वहाँ उन्होंने एक बड़े ही विचित्र आकारका राक्षस देखा, जिसके वक्षःस्थलमें ही एक बड़ा भारी मुख था, जो नेत्र तथा कर्ण आदिसे रहित था॥२॥  इस राक्षसकी भुजाएँ एक-एक योजन तक फैली हुई थीं। यह सम्पूर्ण प्राणियोंकी हिंसा करनेवाला 'कबन्ध' नामक दैत्यराज था॥३॥  उसकी भुजाओंके बीचमें चलते हुए उनसे घिरे हुए राम और लक्ष्मणने उस महाबलवान् राक्षसको देखा॥४॥  तब रामचन्द्रजीने हँसते हुए कहा— "लक्ष्मण! इस राक्षसको देखो; यह सिर-पैरसे रहित है और इसकी छातीमें ही मुँह है॥५॥  अपनी भुजाओंसे ही इसे जो कुछ मिल जाता है उसीको खाकर यह जीवित रहता है। हम भी निश्चय ही इसकी भुजाओंके बीचमें फँस गये हैं॥६॥  हे रघुनन्दन! इसके चंगुलमेंसे निकलनेका हमें कोई मार्ग दिखायी नहीं देता; अब हमें क्या करना चाहिये? (जल्दी विचार करो नहीं तो) यह हमें अभी खा जायगा"॥७॥ *लक्ष्मण...